मर्यादा में रहे ! यहां  सवाल भारतीय गरिमा का है

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आदित्य तिक्कू।।

हमारा चीन के साथ विवाद चरम पर है। विवाद सीमा को लेकर चल रहा है, परंतु वास्तविकता में इसका केंद्र बिंदु व्यापार है। अगर पूरे घटना क्रम को ध्यान से देखा जाये तो सब स्पष्ट हो जायेगा। इस बात को भारतीय समझते  है। इसलिए ही चीन का विरोध तक़रीबन सभी जगह हो रहा है। सभी लोग समान खरीदने  से लेकर  ऐप डाउनलोड तक सतर्क हो रहे हैं। इस अवस्था को आत्मनिर्भरता का पहला कदम कहा जा सकता है। परंतु इन कदमों को रोकना नहीं है, जबतक विश्व में हमारे उत्पादों का डंका ना  बजने लगे।

जवान सीमा पर विवाद और भारतीय चाइना के उत्पादों को अलविदा करेंगे। अधिकतर भारतीयों को पूर्ण विश्वास है। परंतु कुछ राजनीतिक दलों और विशेषकर कांग्रेस का व्यवहार ऐसा है, जैसे गलवन घाटी का संगीन मामला चीन और भाजपा के बीच का हो। राष्ट्रीय सुरक्षा के इस गंभीर मामले पर कांग्रेस के  पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बयानों को देखकर तो यह लगता है कि वह मोदी सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हिसाब चुकता करने के लिए ऐसे ही किसी मौके का इंतजार वर्षों से कर रहे थे।

मेरी समझ से तो परे है कि  आखिर राहुल गांधी प्रधानमंत्री के लिए ऐसे बिगड़े बोल बोलकर क्या हासिल करना चाह रहे हैं कि वह कहां छिपे हैं, बाहर क्यों नहीं आते ?  ऐसी भाषा से तो प्रधानमंत्री के प्रति उनकी घृणा ही उजागर होती है। १९ जून को वह 50 साल के हो गए है। ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे, व थोड़ी सी गंभीरता और परिपक्वता भी प्रदान करे। फिलहाल अभी तो इनसे कोसो दूर ही है। यह पहली बार नहीं जब रक्षा और विदेश नीति से जुड़े गंभीर मसलों पर उन्होंने घोर अपरिपक्वता का परिचय दिया हो। क्या यह कोई भूल सकता है कि डोकलाम विवाद के समय वह किस तरह गुपचुप रूप से चीन राजदूत से मिलने चले गए थे? तब चीनी दूतावास इस मुलाकात की सूचना दे रहा था, लेकिन कांग्रेसी नेता इससे इंकार कर रहे थे।

गलवन घाटी की घटना के बाद राहुल गांधी की परस्थिति की नज़ाकत को समझने के बजाय उलटे-सीधे बयान देने में लगे हुए हैं। इसलिए उनके समर्थक उनसे भी दो कदम आगे दिख रहे हैं।  ऐसी सस्ती राजनीति से देश का हित सधेगा या फिर जाने-अनजाने भारत विरोधी ताक़तों को बल मिलेगा? किसी भी तरह का राष्ट्रीय संकट हो वह केवल सत्ताधारी दल की ही परीक्षा नहीं लेता, वह विपक्षी दलों की भी जांच करता है। राहुलजी राजनीति  करिये  पर देश के साथ नहीं। पहले सोनिया गांधी अध्यक्ष थी, उनकी जगह फिर आप अध्यक्ष बन गए, फिर वो बनी और कुछ समय बाद आप ही अध्यक्ष बनेंगे, अपनी कांग्रेस-ई पार्टी के। आप को पुन: स्थापित करने के लिए दरबारी थोड़ा तो इंतजार कर ही सकते है।

विपक्ष का अधिकार है कि वह सवाल पूछे, परंतु मर्यादा में रहकर यहां  सवाल 130 करोड़ जनता का और भारतीय गरिमा का है। वामदलों से तो कभी यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च महत्व देंगे, लेकिन कांग्रेस से इसकी अपेक्षा अभी भी की जाती है कि यह एकता, एकजुटता का समय है, इस समय को ऐतिहासिक बनाना है ! …. जी हां हमे।

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