समझिये : अमेरिका-चीन के बीच का व्यापार युद्ध

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अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने चीन से आयात होने वाले सामानों पर शुल्क दर 10% से बढ़ाकर 25% कर दिया। 200 अरब डॉलर (करीब 140 खरब रुपये) मूल्य की चीनी वस्तुओं पर शुल्क वृद्धि के ऐलान के बाद से अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव की स्थिति कायम है।
दरअसल, विभिन्न देश शुल्क वृद्धि को अपनी राष्ट्रीय नीति के रूप में आजमाते रहे हैं जिसे ज्यादातर विशेषज्ञ इससे संबंधित सभी राष्ट्रों के लिए नुकसानदायक बताते हैं। बावजूद इसके ट्रंप ने इस नीति को यूरोप, कनाडा और दूसरे महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदारों के खिलाफ इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं किया। खासकर, अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के खिलाफ प्रयोग में आने से यह नीति चर्चा का केंद्र बन गई।
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि चीन की सरकार आर्टिफिशियन इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स और इलेक्ट्रिक वीइकल्स जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के मामले में चीनी कंपनियों को बढ़त दिलाने की अनैतिक प्रयास करती है। स्वतंत्र विश्लेषक भी ट्रंप ऐडमिनिस्ट्रेशन के इस दावे से सहमति जताते हैं।
पेइचिंग की रणनीति में व्यापारिक रहस्यों को चुराने के लिए अमेरिकी कंपनियों के कंप्यूटरों की हैकिंग, चीनी के बाजार में उतरने के लिए विदेशी कंपनियों को संवेदनशील तकनीक साझा करने को मजबूर करना और चीनी कंपनियों को अनुचित रूप से सब्सिडी देना शामिल हैं। अमेरिका इन गतिविधियों का विरोध करता है। ट्रंप ने चीन के साथ व्यापार घाटे पर भी गुस्सा दिखाया। उनकी नजर में इसके लिए अमेरिकी की पहले की सरकारें जिम्मेदार हैं जिन्होंने चीन के साथ नुकसानदायक समझौता किया।
ट्रंप ने पिछले साल के जुलाई महीने से चीन से आयातित वस्तुओं पर धीरे-धीरे शुल्क लगाने शुरू किए। शुक्रवार को नए सिरे से शुल्क वृद्धि के बाद अब 250 अरब डॉलर के चीनी सामानों पर 25% की दर लागू हो गई है। इसके जवाब में चीन ने अमेरिका से आयातित 110 अरब डॉलर (करीब 77 खरब रुपये) मूल्य की वस्तुओं पर टैक्स लगा दिया। इन वस्तुओं में कृषि उत्पाद, खासकर सोयबीन प्रमुख है। इसके पीछे अमेरिकी किसानों पर प्रहार करना है जो ट्रंप के समर्थक माने जाते हैं। आइए समझते हैं कि शुल्क क्या होते हैं और ये कैसे काम करते हैं…
शुल्क (टैरिफ) क्या होते हैं?
आयात पर लगने वाले कर या टैक्स, शुल्क या टैरिफ कहलाते हैं। शुल्क उस रकम का कुछ प्रतिशत होता है जो खरीदार कीमत के रूप में विदेशी विक्रेता को चुकाते हैं। अमेरिका में टैरिफ को कभी-कभार ड्यूटी या लेवी भी कहा जाता है। इन्हें देशभर के 328 बंदरगाहों पर वसूलने की जिम्मेदारी कस्टम्स ऐंड बॉर्डर प्रॉटेक्शन एजेंट्स पर होती है। टैरिफ, ड्यूटी या लेवी के रूप में जमा रकम अमेरिकी सरकार के खजाने में जमा होती है। यूएस इंटरनैशनल ट्रेड कमिशन शुल्क दरों का प्रकाशन हार्मोनाइज्ड टैरिफ शेड्यूल में प्रकाशित करता है जिसमें हर वस्तु पर शुल्क की दर निर्धारित होती है।
कभी-कभार अमेरिका ऐसी वस्तुओं के आयात पर अतिरिक्त शुल्क भी लागू करता है जिनके बारे में उसे लगता है कि ये वस्तुएं अनुचित रूप से बहुत कम कीमतों पर बिक रही हैं या जिन पर दूसरे देशों की सरकारें सब्सिडी देती हैं।
शुल्क लगाकर हासिल क्या होता है?
शुल्क लगाकर दो चीजें हासिल होती हैं। पहली- सरकार का राजस्व बढ़ता है और दूसरी- घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण मिलता है। 1913 में फेडरल इनकम टैक्स लागू होने से पहले टैरिफ अमेरिकी सरकार के लिए धन जुटाने का बड़ा जरिया था। डार्टमाउथ कॉलेज के अर्थशास्त्री डगलस इरविन के मुताबिक, 1790 से 1860 तक फेडरल रेवेन्यू का 90% हिस्सा टैरिफ से ही आया करता था। इसके उलट, हाल के दिनों में फेडरल रेवेन्यू में टैरिफ का योगदान महज 1 प्रतिशत के आसपास सिमट गया।
टैरिफ से आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ाई जाती हैं या अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए विदेशी व्यापारिक भागीदारों को दंडित किया जाता है। निर्यातकों को सब्सिडी देना और अनुचित रूप से कम कीमतों में सामान दूसरे देश भेजना, अनुचित व्यापार व्यवहार के दायरे में आता है। ऐसी परिस्थिति में आयातक देश टैरिफ लगाकर विदेशी वस्तुओं को महंगा कर देता है। इस तरह आयात करना महंगा हो जाता है और धीरे-धीरे आयात की मात्रा में गिरावट आ जाती है। बाजार में आयातित वस्तुओं की आपूर्ति घटने से घरेलू कंपनियों को दाम बढ़ाने का मौका मिल जाता है। इस तरह सरकारें आयात पर शुल्क लगाकर या लगे हुए शुल्क की दर बढ़ाकर घरेलू कंपनियों की मदद करती हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक व्यापार में वृद्धि हुई तो टैरिफ लगाने की नीति खत्म होने लगी। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के गठन और उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नॉर्थ अमेरिका फ्री ट्रेड अग्रीमेंट) जैसे व्यापारिक समझौतों से टैरिफ लगाने की परंपरा पर विराम लग गया। प्यू रिसर्च सेंटर के रिपोर्ट कहती है कि अभी अमेरिका का औसत शुल्क दर 1.6 प्रतिशत है जो दुनिया के विभिन्न देशों की न्यूनतम शुल्क दरों में एक है। यूरोपियन यूनियन की औसत शुल्क दर भी 1.6 प्रतिशत ही है।
क्या शुल्क लगाना अच्छी नीति है?
ज्यादार अर्थशास्त्री इससे इत्तेफाक नहीं रखते। टैरिफ लगने के कारण उन लोगों और कंपनियों के लिए आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिन्हें इनकी जरूरत होती है। साथ ही, प्रतिस्पर्धात्मक दबाव कम करने से घरेलू कंपनियों को दाम बढ़ाने का मौका मिल जाता है। इससे उत्पादकों को तो लाभ होता है, लेकिन ग्राहकों की जेबें कटती हैं।
मसलन, जो अमेरिकी कंपनियां स्टील खरीदती हैं, उनकी शिकायत है कि आयातित स्टील पर शुल्क बढ़ने से वे बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं क्योंकि विदेशी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को कम लागत में कच्चा माल मिल जाता है। इसलिए, वे सस्ते में स्टील प्रॉडक्ट्स बाजार में बेच पाते हैं।ऊंची कीमतों पर कच्चे माल की खरीद के कारण घरेलू कंपनियों को निर्मित उत्पादों की ज्यादा लागत आती है, इसलिए वे सस्ते में सामान नहीं बेच पाते। इस तरह उनके सामानों की मांग कम होती जबकि विदेशी कंपनियों की ज्यादा।
2002 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भी आयातित स्टील पर टैरिफ लगा दिया था। एक अध्ययन में पाया गया कि उस टैरिफ की वजह से 2002 में दो लाख अमेरिकियों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था।
इससे भी बड़ी बात यह है कि शुल्क के जरिए आयात पर पाबंदी लगाने की नीति से अर्थव्यवस्था की गति थम जाती है। विदेशी कंपनियों की चुनौतियां घटने के कारण घरेलू कंपनियां लापरवाह हो जाती हैं और उनमें अपना बेहतरीन देने और खुद को लगातार उन्नत बनाए रखने की भावना खत्म होने लगती है।

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