भंवाल में प्रसिद्ध भुंवाल माता मन्दिर में पधारे युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

  • लगभग सात किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे भुंवाल माता मन्दिर सेवा ट्रस्ट परिसर
  • चित्त हो निर्मल तो बनी रह सकती है शारीरिक, मानसिक और भावात्मक शुद्धता : शांतिदूत महाश्रमण

28.11.2022, सोमवार, भंवाल, नागौर (राजस्थान)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में राजस्थान के नागौर जिले में गतिमान हैं। अपनी धवल सेना के साथ आचार्यश्री तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक, व प्रथम अनुशास्ता महामना आचार्य भिक्षु की जन्मभूमि कंटालिया तथा निर्वाणभूमि सिरियारी की ओर बढ़ रहे आचार्यश्री भक्तों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए भंवाल गांव स्थित प्रसिद्ध भुंवाल माता मंदिर में पधारे। मंदिर में व्याप्त मां कालका और मां ब्रह्माणी की दो प्रतिमाओं में से मां कालका की प्रतिमा प्रतिदिन किसी आस्थावान व्यक्ति द्वारा चढ़ाई जाने वाली मदिरा का सोने की एक छोटी प्याली से ढाई प्याली ग्रहण करना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र माना जाता है तो वहीं अन्य लोगों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
सोमवार को प्रातः आचार्यश्री महाश्रमणजी धनेरिया लील से मंगल गतिमान हुए। मार्ग में अनेक स्थानों पर ग्रामीणों को अपने मंगल दर्शन और आशीर्वाद से लाभान्वित करते हुए आचार्यश्री लगभग सात किलोमीटर का विहार कर भंवाल गांव के भुंवाल माता मन्दिर में पधारे। आचार्यश्री मन्दिर के गर्भगृह तक पधारे जहां मंदिर आदि के विषय में लोगों ने दी जानकारी दी। आचार्यश्री ने मंदिर परिसर का अवलोकन बाहर बने मां भुंवाल जन सेवा ट्रस्ट द्वारा बने विश्रामालय में पधारे।
प्रवास स्थल से कुछ दूरी पर ट्रस्ट के दूसरे विश्रामालय में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री ने उपस्थित जनता को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में चित्त का परम महत्त्व होता है। शरीर की सक्रियता तभी तक बनी रहती है, जब तक शरीर में चेतना होती है। चेतना अर्थात् आत्म तत्त्व के बिना तो शरीर किस काम का। जीवन में शरीर, वाणी और मन सबका अपना-अपना स्थान होता है। धातुओं से बंधा यह शरीर चित्त के वशीभूत होता है। आदमी को अपने चित्त को सुरक्षित और स्वस्थ बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। चित्त की निर्मलता और स्वस्थता को बनाए रखने के लिए मन को वंश में करने का प्रयास करना चाहिए। मन वश में होता है तो दुःखों का नाश हो सकता है। आदमी को अपने मन को सुमन बनाने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी के 66वें जन्मदिवस पर मंगल शुभाशीष प्रदान करते हुए खूब अच्छी सेवा, साधना, स्वाध्याय व धर्मसंघ की सेवा में रत रहने की मंगलकामना की। इसके पूर्व साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने अपने जन्मदिवस के अवसर पर आचार्यश्री से मंगल आशीष मांगते हुए भंवालवासियों को उद्बोधित किया। कार्यक्रम में साध्वीवर्या संबुद्धयशाजी का भी उद्बोधन हुआ। अपने कुलदेवी के स्थान में आचार्यश्री के आगमन से हर्षित श्रद्धालुओं ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्री अभयराज बैंगानी, भुंवाल माता जन सेवा ट्रस्ट की ओर से श्री इन्द्र बैंगानी, श्री भव्य बैंगानी व श्री रितिक बोथरा ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल, तेरापंथ कन्या मण्डल तथा श्री सम्पतराज पुगलिया ने पृथक्-पृथक् गीत का संगान किया।

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