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Reading: अध्यात्म साधना का लक्ष्य है आत्मा की शुद्धि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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अध्यात्म साधना का लक्ष्य है आत्मा की शुद्धि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: February 8, 2026 1:28 am
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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Highlights
  • सुधर्मा सभा से प्रवाहित होने लगी ज्ञानगंगा की अविरल धारा
  • लाडनूंवासियों की ओर से आज भी हुआ आचार्यश्री का नागरिक अभिनंदन समारोह
  • अनेक संस्थाओं ने श्रीचरणों में अर्पित किए अभिनंदन पत्र
  • 2028 में शांतिदूत पधारेंगे हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी

लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान)। योगक्षेम वर्ष जैसा महामंगल उत्सव लेकर लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में बने ‘महाश्रमण विहार’ में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी विराजमान हो चुके हैं। उनकी आभा से पूरे जैन विश्व भारती परिसर में अलौकिक आभा का मानों प्रसार हो रहा है। आचार्यश्री के महामंगल प्रवेश के अवसर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री का आगमन भी हो गया। अब आचार्यश्री की अविरल ज्ञानगंगा की धारा लगभग तेरह महीने तक इसी परिसर से प्रवाहित होगी।
शनिवार को सुधर्मा सभा में आज भी लाडनूं की ओर से नागरिक अभिनंदन समारोह का क्रम संचालित हुआ। इस क्रम में तेरापंथी सभा-लाडनूं के अध्यक्ष श्री प्रकाशचंद बैद, तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री सुमित मोदी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। लाडनूं ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। स्थानीय तेरापंथ कन्या मण्डल की कन्याओं ने भी अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आत्मा की शुद्धि अध्यात्म साधना का लक्ष्य होता है। वह शुद्धि धर्म की साधना के द्वारा अध्यात्म की साधना के द्वारा हो सकती है। अध्यात्म की साधना के अनेक आयाम हैं- अहिंसा की आराधना, संयम की साधना और तप का आसेवन। ये सभी आत्म शुद्धि के उपाय हैं। इन सब चीजों का ज्ञान स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त होता है।
मानव जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। पहले ज्ञान होता है, फिर दया और उसके अनुरूप आचरण होता है। स्वाध्याय व अध्ययन के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाध्याय के साथ ध्यान का भी महत्त्व है। चित्त की स्थिरिता व निर्मलता के लिए ध्यान का प्रयोग किया जा सकता है। ध्यान भी दो प्रकार से हो सकता है। एक आदमी सारा कार्य छोड़कर ध्यान करे। शरीर की स्थिरता जितनी सघन होती है, वह मन की एकाग्रता में सहायक बन सकती है। आचार्यश्री ने कहा कि हम जैन विश्व भारती में स्थित हैं। हमारे यहां प्रेक्षाध्यान के नाम से ध्यान की पद्धति चलती है।

ध्यान की अनेक पद्धतियां हैं। उन ध्यान पद्धतियों का अपना अलग सिद्धांत हो सकता है, किन्तु ध्यान का मूल लक्ष्य स्थिरता व आत्मा की निर्मलता ही होती है। योग साधना और अयोग साधना हो, लक्ष्य दोनों का एक ही है। आत्मा को मोक्ष से जोड़ने वाली विधा योग-साधना होती है। ध्यान प्रत्येक आदमी के जीवन में होना चाहिए। ध्यान मानव व्यवहार के जीवन में कितना जुड़ा है। आदमी जो भी कार्य करे, उसमें एकाग्र हो जाना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि अभी हम जैन विश्व भारती में हैं। इतने साधु-साध्वियां, समणियां, मुमुक्षु बाइयां रहती हैं। लाडनूं में आना हुआ है।
परम पूज्य गुरुदेव तुलसी की जन्मभूमि, दीक्षाभूमि और कुछ अंशों में कर्मभूमि भी है। लगातार दो-दो चतुर्मास यहां हुए हैं। गुरुदेव तुलसी इस जैन विश्व भारती परिसर में कितना-कितना भ्रमण करते थे। यहां हमारा आना हुआ है। कल भी स्वागत का क्रम चला। आज भी प्रस्तुतियां हुई हैं, होने वाली हैं। लाडनूं का आभूषण है-जैन विश्व भारती। ऐसी जैन विश्व भारती संस्था में हमारा लम्बे प्रवास के प्रयोजन में आना हुआ है। जीवन में धार्मिक-आध्यात्मिक रूप में पर-स्वकल्याण का प्रयास करते रहें। मुनि जयकुमारजी ने अपनी हर्षाभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री के हरिद्वार और ऋषिकेश पधारने की प्रार्थना की। करुणावतार आचार्यश्री ने इस संदर्भ में कहा कि मुनि जयकुमारजी ऋषिकेश चतुर्मास करके आए हैं। इन्होंने अभी जो कहा है, मैं इस बारे में कुछ कहने जा रहा हूं। फिर आचार्यश्री ने भगवान महावीर, आचार्यश्री भिक्षु स्वामी, परम पूज्य गुरुदेव तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का स्मरण करते हुए कहा कि सन् 2028 के मर्यादा महोत्सव के बाद यथासंभवतया अनुकूलता के अनुसार हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, यमुनानगर व जागदड़ी जाने का भाव है। आचार्यश्री की इस घोषणा के साथ ही पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गूंज उठा।
जैन विश्व भारती के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कीर्तिकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। जैन विश्व भारती के ट्रस्टी श्री राजेश दुगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुस्लिम समाज की ओर से लाडनूं शहर काजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए मुस्लिम समाज ने अभिनंदन पत्र अर्पित किया। सर्व ब्राह्मण समाज के मंत्री श्री राजकुमार पारिख, रावणा राजपूत समाज की ओर से श्री राजकुमार पंवार, तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम-लाडनूं के अध्यक्ष डॉ. श्रेयांस घोड़ावत ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल की अध्यक्ष श्रीमती आरती कठौतिया, जांगिड़ समाज की ओर से कोषाध्यक्ष श्री गोपाल जांगिड़, सैन समाज के अध्यक्ष श्री रोहित सैन, रेगर समाज की ओर से श्री नवरतनमल रेगर, भारत विकास परिषद के प्रान्तीय कोषाध्यक्ष श्री नितेश माथुर, दिगम्बर जैन समाज की ओर से श्री महेन्द्र सेठी, माली समाज की ओर से श्री हनुमतसिंह पंवार ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए माली समाज की ओर से अभिनंदन पत्र अर्पित किया।
माहेश्वरी समाज के संरक्षक श्री सूरजनारायण राठी, युवक परिषद की ओर श्री जवेरीमल दुगड़, ओसवाल सभा के अध्यक्ष श्री राकेश नाहटा, ओसवाल पंचायत तथा गणगौर मेला समिति की ओर से श्री राजकुमार चोरड़िया, श्री रामआनंद गौशाला श्री सीताराम गौतम ने अपनी अभिव्यक्ति दी। स्वर्णकार सोनी समाज की ओर से श्री दिनेश सोनी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अखिल भारतीय विद्या भारती के महामंत्री श्री देवराज शर्मा ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके अलावा भी अनेक संस्थाओं से संबंधित पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। अणुव्रत समिति की ओर से श्री शांतिलाल बैद ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त लाडनूं के समस्त समाज की ओर से आचार्यश्री को अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया।

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