लगभग 13.8 किमी का प्रलंब विहार कर शांतिदूत पहुंचे कवठेएकंद, तप के प्रकारों का आचार्यश्री ने किया विवेचन
08-03-2020, रविवार, कवठेएकंद , सांगली, महाराष्ट्र। अहिंसा यात्रा द्वारा देशभर में नैतिक चेतना का जागरण करते हुए प्रवर्धमान मानवता के मसीहा शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज प्रातः माधव नगर के जाखोटीया भवन से मंगल विहार किया। मार्ग में पूज्यवर ने श्री राजेंद्र घोड़ावत की अर्ज पर उनके फार्म हाउस के बाहर मंगलपाठ प्रदान किया। तेज धूप में भी समत्वभाव के साथ महातपस्वी महाश्रमण धवल सेना संग अविरल रूप से गंतव्य की ओर गतिमान थे। लगभग 13.8 किलोमीटर का प्रलंब विहार कर पूज्य गुरुदेव कवठेएकंद स्थित न्यू इंग्लिश स्कूल में पधारे। धर्म सभा में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा तपस्या साधना का अंग है अनशन, उनोदरी आदि तप के 12 प्रकार हैं।
नवकारसी, पोरसी छोटे तप है। कायक्लेश, आसान, कायोत्सर्ग भी तपस्या में आ जाता है। इंद्रियों को इंद्रिय विषयों से हटाना भी तपस्या है। प्रायश्चित, विनय व वैयावृत्य भी तप में आ जाते हैं। हमारे पुर्वाजित कर्मों को हटाने का साधन तप है। तपस्या से निर्जरा होती है। तपस्या कर्मों को काटने का बहुत बड़ा साधन है।
गुरुवर ने आगे कहा कि जैसे दावानल जंगल को नष्ट कर देता है, जैसे बादल अग्नि को शांत कर देता है वैसे ही कर्म समूह को नष्ट करने के लिए तप के सिवाय साधन नहीं है। सोने का स्वरूप अग्नि से प्रकट हो जाता है वैसे ही आत्मा के कर्मों को नष्ट करके तपस्या आत्म स्वरुप को निर्मल बना देती है। व्यक्ति हो सके उतना तप करें। कितने व्यक्ति वर्षीतप करते हैं। एक दिन का उपवास एक दिन का पारणा, जैसे शासन में न जाने कितने वर्षीतप होते हैं। उसके साथ अगर जप, नियम जुड़ जाए तो तप विभूषित हो जाता है। संवर, चारित्र के साथ तप आ जाए तो चारित्र का भूषण तप बन जाता है। हम जीवन में तप की आराधना करते रहे। तप से जीवन अलंकृत करें तो आत्मा धन्य हो सकती है।
कार्यक्रम में विद्यालय के शिक्षक दिगंबर जैन भाई सुधीर सिरोठी ने शांतिदूत के अभिनंदन में अपने विचार रखें।

