मुंबई। थामला निवासी मरोल प्रवासी स्वामीजी गणपतजी कुमठ के ज्येष्ठ पुत्र ,राजेश जी के बडे भाई ,मोड़ीलाल जी बड़ाला की पुत्री ऊषा कुमठ के जीवनसाथी व माताजी सोहन देवी के लाडले श्री प्रकाश जी कुमठ का 14 जनवरी 2020 को आकस्मिक निधन हो गया।
प्रकाशजी का जन्म 24 मई 1968 को थामला में हुआ।थामला और मावली से अपनी प्राईमरी व हायर सेकंडरी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा नाथद्वारा सेठ मथुरादास बिनानी कॉलेज द्वारा कॉमर्स में डिग्री हासिल कि।अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे व्यवसाय हेतु मुंबई में बस गए।
प्रकाश जी बहुत ही मिलनसार स्वभाव के थे।परिवार को साथ लेकर चलने वालों में थे।वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं था। ना शब्द तो जैसे उनकी डिक्शनरी में था ही नहीं। वे बहुत ही सहायक प्रकृति के थे।खरी बात मुँहपर कहने वाले व जिगरबाज व्यक्ति थे, वह तेरापंथ युवक परिषद अंधेरी से जुड़े हुए थे वह उसमें अच्छे कार्यकर्ता थे समाज में सभी से मैत्रीपूर्ण व्यवहार था व सहयोग की भावना से समाज में काम करते थे चातुर्मास के समय प्रवचन में प्रतिदिन सामायिक करते थे
आगम मनीषी प्रोफेसर श्री महेंद्र मुनी श्री ने भी अपने संदेश में फरमाया था कि वे एक ऊर्जावान और कर्मठ श्रावक थे। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी होने के साथ साथ उदारभावना से ओतप्रोत रहकर सदा समाज की प्रगति के हित में सोचने वाले व्यक्ति थे।
थामला के सभी मित्रों का मानना है कि प्रकाश जी कुमठ थामला गांव के व परिवार के ध्रुव तारा थे।कर्मनीष्ठ,धर्मनीष्ठ व्यक्तित्व के धनी थे।अपनी जन्म भूमि की प्रगती के लिए सतत जागरूक रहते थे वह उनको जन्मभूमि से विशेष प्यार था वह अपने गांव महीने में एक बार अवश्य जाते थे।आज प्रकाश जी के जाने से ऐसा लग रहा है जैसे थामला वासियों ने अपना कोहिनूर हीरा खो दिया है।
श्रीमान प्रकाश जी कुमठ के आकस्मिक निधन से परिवार ने ही नहीं बल्कि समाज ने भी अपना अमुल्य रत्न खो दिया है।जन्म और मृत्यु मनुष्य के हाथ में नहीं है,लेकिन जीवन के बीच का अंतराल मनुष्य के अपने हाथों में हैं।जीवन तो सभी जीते हैं,परंतु सही मायने में जीवन जीना,या जीवन जीने की सही कला विरले ही जानते हैं।जिसमें एक नाम हमारे प्रकाश जी का भी दर्ज हैं।
विरले व्यक्तित्व होते हैं जो दुनिया से विदा होकर भी अमरता को वरते है।प्रकाश जी कुमठ का व्यक्तित्व अपने पिताश्री गणपत जी की तरह दबंग था।अपनी दोनों बेटियों खुशी व प्रिया को परियों की तरह सुसंस्कारी और आत्मनिर्भर बनाया व अपने पुत्र विदित से अपार स्नेह था।
प्रकाश जी का गुणगान उनके संस्मरणों जितना ही अंतहिन है।
“यूं तो जिंदगी सब जीते हैं,
लोग आते जाते रहते हैं,
पर धन्य पुरुष वे होते हैं,
जो समाज और मित्रों के
दिलों पर छा जाते हैं व
बरसों बरसों याद आते रहते है।
इस भव्य आत्मा को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।
स्मृति शेष प्रकाश जी कुमठ थामला

