By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
सुरभि सलोनीसुरभि सलोनीसुरभि सलोनी
  • National
  • State
  • Social
  • Entertainment
  • Mumbai / Maharashtra
  • Video
  • E-Magazine
Reading: एक चुनौती क्लाइमेट इमरजेन्सी
Share
Font ResizerAa
सुरभि सलोनीसुरभि सलोनी
Font ResizerAa
  • National
  • State
  • Social
  • Entertainment
  • Mumbai / Maharashtra
  • Video
  • E-Magazine
Search
  • Business
  • entertainment
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
© 2022 Surabhi Sloni All Rights Reserved.
new_issue

एक चुनौती क्लाइमेट इमरजेन्सी

Last updated: December 23, 2019 3:52 pm
Surabhi Saloni
Share
11 Min Read
SHARE

अरुण तिवारी।

‘’यह ’क्लाइमेट इमरजेन्सी’ है…जलवायु आपात्काल! यदि जीवमण्डल के संरक्षण के लिए उचित कदम तत्काल न उठाए गए, तो अनकही पीड़ा सामने आएगी।’’ एक तरफ दुनिया के 153 देशों के 11 हज़ार से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से जारी यह चेतावनी है और दूसरी तरफ हमारी दिल्ली! पिछले चार साल में खराब हवा के दिन – 1440; बेहद खराब हवा की अवधि – तीन माह; अच्छी हवा की उपलब्धता – मात्र पांच दिन। 14 चिन्हित स्थान ऐसे, जिनकी वायु गुणवत्ता, शेष दिल्ली की तुलना में हमेशा खराब। वायु प्रदूषण के कारण इंसानी मौतों का आंकड़ा – 30,000 प्रति वर्ष। फिर भी क्या पीड़ित पब्लिक के रूप मंे दिल्लीवासियों ने खुद कोई ऐसी व्यापक पहल की कि लगे क्लाइमेट इमरजेन्सी है ? डांट व आदेश तक सीमित सर्वोच्च अदालत। मास्क और एयर-प्यूरीफायर बेचती कम्पनियां। प्रदूषण, पराली और सम-विषम – एक सप्ताह तक इन तीन शब्दों को ताश के पत्तों के तरह फेंटती-बांटती दिल्ली की पॉलिटिक्स, प्रशासन, शासकीय विज्ञापन और मीडिया; तत्पश्चात् चुप्पी। इमरजेन्सी में किसी चिकित्सक व परिचारकों के कर्तव्य क्या ये ही हैं?
————————-
स्पष्ट निष्कर्ष
प्रश्न कई हो सकते हैं किन्तु दिल्ली प्रदूषण के दर्ज आंकड़े, दर्ज पीड़ा और बीते पखवाड़ा प्रकरण से उपजे दो निष्कर्ष एकदम स्पष्ट हैं: पहला, क्लाइमेट इमरजेन्सी और इसके दुष्प्रभाव वर्ष-दर-वर्ष की परिस्थिति है; इसे सिर्फ स्मॉग-टाइम इमरजेन्सी मानना, एक ग़ल़ती। स्पष्ट है कि इसकी मुख्य आरोपी सिर्फ त्यौहारी पटाखे, पराली जलाना व स्मॉग जैसी अल्पावधि घटनायें नहीं हो सकतीं। अतः न तो पटाखा-पराली दाह नियंत्रण और सम-विषम जैसे अल्पकालिक फार्मूले सम्पूर्ण समाधान साबित हो सकते हैं और न ही एयर-प्यूरीफायरों खरीद-बिक्री। समस्या का निवारण, मूल कारणों की समग्रता में तलाशा जाना चाहिए। सम्पूर्ण समाधान की रणनीति भी राज, समाज व बाज़ार…तीनों की नीति, नीयत व क्षमता की पूरी जांच-परख के साथ बनाई जानी चाहिए।
दूसरा यह कि मौसम की कोई प्रशासनिक सीमा नहीं होती; अतः क्लाइमेट इमरजेन्सी सिर्फ दिल्ली तक सीमित हो; यह तार्किक नहीं। नासा की तसवीरें इसका समर्थन करती हैं। दीवाली बाद का स्मॉग सिर्फ दिल्ली नहीं, उत्तर के पूरे मैदान पर हमसाया रहा। बकौल ग्रीनपीस रिपोर्ट – 2018, दुनिया के सर्वाधिक वायु-प्रदूषित 10 नगरों में 07 भारत के हैं। हालांकि इसका एक कारण, स्थानीय प्रदूषकों के मद्देनजर भारत की वायु गुणवत्ता सूचकांक में अमोनिया व सीसा जैसे मानकों को शामिल किया जाना हो सकता है। अमेरिका समेत कई देशों के मुख्य मानकों में पीएम-10, पीएम- 2.5, ट्राइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड व सल्फर डाइ ऑक्साइड… कुल पांच तत्व ही शामिल हैं।
अब यदि भारत के सर्वाधिक वायु-प्रदूषित 10 नगरों में कोलकोता, विशाखापतनम, हैदराबाद, चेन्नई, मदुरई, बंगलुरु, पुणे, मुंबई जैसे किसी नगर का नाम नहीं, तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि इनमें वायु-प्रदूषण का कोई कारण मौजूद नहीं है। इनकी वायुमण्डलीय बेहतरी, इनके समुद्रतटीय होने के नाते है। समुद्रतटीय हवा की दिशा, वेग, बारिश, शीतलता और ताप की अनुकूल स्थानीय मौसमी परिस्थितियां प्रदूषित तत्वों को एकत्र नहीं होने देती। किंतु इसका मतलब, समुद्रतटीय नगरों को प्रदूषित करने का लाइसेंस मिल जाना नहीं है। समुद्र का तल व ताप जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उनसे समुद्रतटीय नगर डूब भी सकते हैं और बदले हवा के रुख के कारण किसी दिन प्रदूषित नगरों की सूची में नंबर वन पर भी आ सकते हैं।

बुनियादी तथ्य
बुनियादी तथ्य यह है कि स्मॉग में मौजूद स्मोक यानी धुआं सिर्फ पत्ते-पराली जलाने से नहीं पैदा होता; यह अन्य कूड़ा-कचरा, ईधन, पटाखे, गैस, भोज्य पदार्थों आदि के जलने, धातु, पत्थर, लकड़ी, रबर, प्लास्टिक आदि के गलने, रगड़ने तथा शीतलन की अनेक प्रक्रियाओं से भी उत्पन्न होता है। ये प्रक्रिया हमारी रसोई, जंगलों, फैक्टरियों, गाड़ियों, उपकरणों आदि में साल के बारह महीने चलती रहती हैं।
तथ्य यह भी है कि वायु प्रदूषण का मतलब, सिर्फ वायुमण्डलीय में मौजूद गैसों में सिर्फ कार्बन डाइ ऑक्साइड अथवा कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा का आवश्यकता से अधिक बढ़ जाना नहीं होता; यह क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, सीसा, अमोनिया, धूल, ओजोन गैस, मीथेन, सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि का नुक़सानदेह सम्मिश्रण भी होता है। इनका उत्पादन हेयर डाई, चूड़ी, पेंट, कागज़, धातु, पनबिजली निर्माण, वातानुकूलन, शीतलन व कचरा सड़ान जैसी कई जैविक, रासायनिक व भौतिक प्रक्रियाओं के दौरान होता ही है।
दिल्ली की हवा में मिश्रित पार्टिकुलेट मैटर में धूल की अत्याधिक मात्रा, सबसे बड़ी चुनौती है। आंकड़ा है कि मौजूदा वाहन टायरों की कुल रबड़ में से करीब एक लाख किलोग्राम घिसकर प्रति वर्ष दिल्ली की धूल व हवा में मिल रही है। धूल की बढ़ोत्तरी में सड़क निर्माण में सीमेंट प्रयोग, खनन, मिट्टी-कचरे को ढोकर ले जाने तथा ज़मीन की ऊपरी परत में घटती नमी यानी उतरते भूजल, बढ़ते वाष्पीकरण व बढ़ते रेतीले क्षेत्रफल का भी भरपूर योगदान है। जाहिर है कि कारण कई हैं, तो समाधान के कदम भी कई ही होंगे।

बाधित समाधान
समाधान हासिल की दिशा में एक तथ्य यह है कि भारत में वायु प्रदूषण के खिलाफ पहला क़ानून (बंगाल स्मोक न्यूसेंस एक्ट – 1905) 114 साल पुराना है। बाधा यह है कि किंतु वायु प्रदूषण क़ानूनों को लागू करने में भारत आज भी बेहद लापरवाह देश है। बाधाएं, प्रदूषण को नज़रअंदाज करके बनाई, अपनाई व प्रोत्साहित की जा रही तक़नीक व जीवन-शैलियां भी पेश कर रही हैं।
बाधाएं कई हैं, किंतु इमरजेन्सी होने पर भी समाधान के लिए तो सरकारों की ओर ताकना अथवा उन्हे गाली देना; समाधान को लागू न होने देने में सबसे बड़ी बाधा, पब्लिक का यह परालवम्बन ही है। क्या हम कभी स्वालम्बी होंगे ?
———————————–
स्मॉग टाइम
‘स्मॉग’ यानी स्मोक + फाॅग यानी धुआंयुक्त धुंध। धुआं यानी कार्बन व गैसें। धुंध यानी वायुमण्डल की निचली परत में जमी हुई नमी । धुंध – मौसमी है। धुंध उसी वक्त जमती है, जब वायुमण्डल में एक खास अनुपात में नमी व ठण्ड होती है। आग, ताप व गति मौजूद हों, धुआं कभी भी उठ सकता है।
धुआं और धुंध आपस में मिलकर ‘स्मॉग’ तब हो जाते हैं, जब सूरज की किरणें नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा बेंजिन व ट्राइक्लोरोइथालिन जैसे कम से कम एक परिवर्तनशील जैविक यौगिक के साथ क्रिया करती हैं। जैविक यौगिकों व गैसों को वायुमण्डल की निचली परत में इकट्ठे करने व बिखेरने में हवा की दिशा व वेग तथा सूरज की किरणों की विशेष भूमिका होती है।
वेग के साथ हुई बारिश धुंध और धुआ..दोनो को धोकर मिट्टी की ऊपरी परत पर फैलाने की क्षमता रखती है। हवा में सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की उपस्थिति में हुई बारिश, अम्लीय हो जाती है। धुआंयुक्त धुंध में धूल, कचरा आदि के ठोस कण अधिक मात्रा में हों, तो यह ऊपर उठने की बजाय, भारी होकर हमारी सांसों में बैठेगी ही बैठेगी। आखिरकार, हम जो कुछ कुदरत को देंगे, वह वही तो लौटाएगी।
——————————
समाधान सूत्र
ए.सी. की बढ़ती संख्या, बढ़ती धूल, बढ़ते निजी वाहन और बढ़ता ई-पॉली-ठोस कचरा और बेज़रूरत उपभोग – दिल्ली वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। समाधान हेतु सर्वप्रथम सादगी को सम्मानित करें; अधिक उपभोग करने वाले को हतोत्ससहित। जीडीपी की बजाय, खुशहाली सूचकांक को अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय आदर्श बनायें। सप्ताह में एक दिन अन्न, ईंधन व नूतन वस्तुओं के उपभोग के उपवास को राष्ट्रीय व्रत मान अपनायें। उपभोग घटायें; यथोचित पुर्नोपयोग बढ़ायें। कार्यालयी कार्यनीति व तबादला नीति को कम खपत हेतु प्रोत्साहित करने वाला बनायें। खुले सामान की शुद्धता सुनिश्चित करें। लागत पर सीमित मुनाफे की एमआरपी का नियम बनायें; ऑनलाइन शॉपिंग घटायें। इससे पैकेजिंग घटेगी; कचरा घटेगा; कार्बन उत्सर्जन घटेगा; स्वच्छता स्वतः बढ़ जाएगी।
4 इन्दौर ने डंप एरिया कचरा निष्पादन हेतु ट्रामल मशीन का उपयोग कर स्वच्छता का प्रथम स्थान हासिल किया है। गीला-सूखे कचरे को अलग-अलग करने करने को हर घर अपनी आदत बनाये। गीले की खाद बनेगी। सूखा निष्पादित हो पुर्नोपयोग में आएगा। कूड़ा जलाना ही नहीं पडे़गा। धुआं स्वतः घट जायेगा।
4पहले साईकिल को राष्ट्रीय वाहन घोषित करें; सार्वजनिक परिवहन, कार-पूलिंग व साईकिलिंग को आदर्श, सर्वसुलभ व सुरक्षित बना उपयोग हेतु प्रोत्साहित करें; रूटों पर बसों की संख्या का संतुलन बनायें; वाहनों की गति व गुणवत्ता नियंत्रित करें; सीसायुक्त पेट्रोल का उत्पादन बंद करने की पहल करें और अक्षय ऊर्जा उत्पादन को सस्ता करें; कार्यालय, विद्यालय और फैक्टरियों के काम की अवधि में विविधता लाएं; तत्पश्चात् ई वाहन लाएं।
4ज़रूरत न हो, तो बिजली, मोबाइल, कम्पयुटर, इंटरनेट व वाई-फाई बिल्कुल न चलायें।
4पीपल, पाकड़, नीम, कदम्ब व खेजड़ी की हर मौसम हरित पंचवटी लगायें; हर परिसर, सड़क व अरावली पर्वतमाला को हरित बनायें। इंडस्ट्रियल एरिया के 30 प्रतिशत क्षेत्रफल में फैक्टरी, 70 प्रतिशत में हरियाली का फार्मूला अपनायें; एयर फिल्टर को आवश्यक बनायें। वर्षाजल संचयन बढ़ायें; खेती को प्राकृतिक बनायें। कार्बन उत्सर्जन घटेगा, अवशोषण बढ़ेगा; वाष्पन घटेगा; मिट्टी की ऊपरी परत में नमी रुकेगी। फैलता रेगिस्तान स्वतः रुक जाएगा। धूल, ए.सी., मास्क से निजात स्वतः मिल जायेगी।
4गांवों की खेती, प्रकृति, सामाजिकता और कुटीर रोज़गार को संरक्षित करें। इससे नगरीकरण हतोत्साहित होगा; जनसंख्या वृद्धि और वितरण भी स्वतः संतुलित हो जायेंगे; पर्यावरण भी।
4राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण को उसके आदेश की पालना कराने हेतु ज़रूरी शक्तियां दें। क़ानून पालना को प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों की संवैधानिक सूची में शामिल करें। नागरिक इसे अपना स्वभाव बनायें।

Sign Up For Daily Newsletter

Be keep up! Get the latest breaking news delivered straight to your inbox.

By signing up, you agree to our Terms of Use and acknowledge the data practices in our Privacy Policy. You may unsubscribe at any time.
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Copy Link Print
Share
What do you think?
Love0
Sad0
Happy0
Sleepy0
Angry0
Dead0
Wink0
Previous Article संजय निरुपम बोले- सावरकर के चक्कर में शिवसेना द्वारा गांधी-नेहरू का अपमान ठीक नहीं
Next Article समय के साथ बदलते रिश्ते

आज का AQI

Live Cricket Scores

Latest News

प्रधानमंत्री कमजोर होने की वजह से ही पेपर लीक हो रहे हैं; धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें : उदय भानु चिब
Mumbai / Maharshtra
June 3, 2026
‘पेड्डी’ के लिए राम चरण ने झेली असली चोटें, दर्द के बीच पूरी की शूटिंग
entertainment
June 3, 2026
नए दमदार पोस्टर के साथ नागबंधम का 30 डेज़ काउंटडाउन शुरू, 3 जुलाई को सिनेमागृह में होगी रिलीज
entertainment
June 3, 2026
प्रधान को तत्काल शिक्षा मंत्री पद से हटाएं मोदी : कांग्रेस
national
June 1, 2026

Sign Up for Our Newsletter

Subscribe to our newsletter to get our newest articles instantly!

Follow US
© 2026 Surabhi Saloni All Rights Reserved. Disgen by AjayGupta
  • About Us
  • Privacy
  • Disclaimer
  • Terms and Conditions
  • Contact
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?