जिव्हा संभली तो जीवन संभला- मुनिश्री जिनेश कुमार जी
पालघर। आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनिश्री जिनेश कुमार जी के सान्निध्य में तथा तेरापंथ सभा पालघर के तत्वावधान में तेरापंथ भवन में पर्युषण पर्व का चौथा दिन वाणी संयम दिवस के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया। विशाल जनमोदीनी को संबोधित करते हुए मुनिश्री जिनेश कुमार जी ने कहा आत्मसाधना साधक का चरम लक्ष्य है। उसके करणीय प्रयोग में एक प्रयोग है वाणी का संयम। अनावश्यक नहीं बोलना ही वाणी का संयम है। जिसको हम मौन भी कहते हैं। मौन भीतर मे प्रवेश करने का प्रथम द्वार है। मौन से आत्मा की आवाज सुनाई देती है। मौन से विचारों का अल्पीकरण होता है। मौन प्रकृति के निकट पहुचाता है। मौन कि साधना से अनावश्यक व्यक्ति विवाद व कलह से बच जाता है। मौन में अद्भुत शक्ति होती है, उर्जा का संचय होता है। एकाग्रता का विकास होता है। वाणी हृदय का थर्मामीटर व विचारों का वाहन है।
मुनिश्री जिनेश कुमार जी ने आगे का मन वचन काया को योग कहते हैं। मन से वक्ती सोचता है। वचन से बोलता है। काया से चेष्टा करता है। वचन सामाजिक संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान भाषा से होता है। भाषा सत्य संयम व प्रियकर होनी चाहिए। वाणी की सभ्यता जीवन की भव्यता है। जिव्हा संभली तो जीवन संभला जिव्हा बिगड़ी जीवन बिगड़ा। प्रत्येक व्यक्ति को बोलने से पहले तोलना चाहिए। वाणी हितकारी, मितकारी व समय के अनुकूल होनी चाहिए। वाणी के असंयम से महाभारत हो जाता है। वाणी के संयम से घर परिवार स्वर्ग बन सकता है। मुनिश्री जी ने भगवान महावीर जीवन दर्शन में वाचन के अंतर्गत भव परंपरा से गुजरते महावीर के पूर्व में भवो में 18 वे भव त्रिपुष्ठ वासुदेव की चर्चा करते हुए कहा जो जैसा कर्म करता है, उसको वैसा फल अवश्य मिलता है। भले ही तीर्थंकर बनने वाले जीव भी क्योंना हो। कर्म अगर सत किये हैं तो अधर्म गति में जाना ही होंगा। इस अवसर पर मुनिश्री जिनेश कुमार जी ने 11 दिनों की तप लेकर उपस्थित हुई सुश्री विद्या नरेश घाटावत को तप प्रत्याख्यान करवाये व तप अनुमोदना करते हुए मंगल कामना व्यक्त की।
मुनि श्री परमानंद जी ने कहा पर्युषण स्वसबोध, संसवाद व शब्द संयम का पावन पर्व है।पर्युषण वाणी सुधारने व निखारने का पावन पर्व है। पानी, मनी और वाणी को सोच समझकर प्रयोग करना चाहिए। आदमी को बोलना सीखने में 2 साल लगते हैं, परंतु क्या बोलना सीखने में पूरी जिंदगी निकल जाती है। लगभग 61 चंदनबाला तेला तप हुए व मौन की पचरंगी भी हुई। इस अवसर पर सु.श्री विद्या नरेश जी घाटावत 11 के तपस्या के प्रत्याख्यान के अवसर पर तेरापंथी सभा पालघर के अध्यक्ष नरेशजी राठौड़ व घाटावत परिवार की बहनों ने अनुमोदना में गीत व विचार व्यक्त किए। अनेक भाई बहनोंने तप के प्रत्याख्यान भी किये। समाचार प्रदाता दिनेश राठौड़।
पालघर में पर्युषण पर्व के चतुर्थ दिन वाणी संयम दिवस मनाया गया

