पटना:बिहार के मुजफ्फरपुर में अक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का प्रकोप जारी है। पिछले 24 घंटों में 20 बच्चों की मौत से बिहार में अब तक 93 मांओं की गोद सूनी हो चुकी है। रविवार को ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने मुजफ्फरपुर में श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (एसकेएमसीएच) का दौरा किया था और बीमारी के प्रकोप पर चिंता जाहिर की थी। हर्षवर्धन के साथ केंद्रीय राज्यमंत्री अश्विनी चौबे और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय भी मौजूद थे।
हर्षवर्धन ने स्वास्थ्य और जिला अधिकारियों के साथ-साथ एसकेएमसीएच के डॉक्टरों के साथ हाई लेवल मीटिंग की। निरीक्षण के दौरान जब हर्षवर्धन एक सिसक-सिसककर रोती हुई मां से मिले तब उन्हें त्रासदी का आभास हुआ। उस मां ने उसी वक्त अपना पांच साल का बेटा खोया था। सूत्रों के मुताबिक, हर्षवर्धन के चार घंटे के दौरे के दौरान ही 3 बच्चों की मौत हो गई। इससे मंत्री और स्वास्थ्य अधिकारी हैरान रह गए।
115 बच्चों का चल रहा इलाज
हर्षवर्धन ने बीमार बच्चों के परिजनों से कहा, ‘बीमारी पर काबू पाने के लिए सरकार अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ेगी। सभी मुमकिन कदम उठाए जाएंगे।’ हर्षवर्धन ने नई दिल्ली जाने से पहले एक और समीक्षा बैठक की थी। मुजफ्फरपुर सिविल सर्जन एसपी सिंह ने बताया कि इस साल जनवरी से एईएस के चलते सबसे ज्यादा 76 बच्चों की मौतें एसकेएमसीएच में हुई। 17 बच्चों की मौत केजरीवाल मैत्रिसदन में हुई।
एसपी सिंह ने बताया कि फिलहाल दोनों अस्पतालों में 115 मरीजों का इलाज चल रहा है। इस दौरान बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने बताया कि डॉक्टरों की एक टीम और पर्याप्त नंबर में पैरामेडिकल स्टाफ को पटना से मुजफ्फरपुर भेजा गया है।
100 करोड़ खर्च, टीका लगाया नहीं
बिहार के मुजफ्फरपुर में साल दर साल एक ही बीमारी से बच्चे मरते रहे हैं। रोकथाम के नाम पर अमेरिका से जापान तक का दौरा होता रहा लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बार भी जब बच्चों की मौतें जारी हैं, तो स्वास्थ्य विभाग इलाज के बजाय ऊपर वाले के रहम पर भरोसा कर रहा है। विभाग चाहता है कि जल्द बारिश हो, जिससे महामारी का प्रकोप थमे। गर्मी बढ़ने के साथ मुजफ्फरपुर में हालात और खराब हो गए हैं। अगर सरकार ने बनी योजना पर अमल किया होता तो मुजफ्फरपुर में बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। वहां अब तक इंसेफलाइटिस पर रोकथाम के लिए सरकार ने रिसर्च और इलाज का उपाय खोजने में 100 करोड़ से ऊपर खर्च किया है लेकिन फिर भी मौतें जारी हैं। रिपोर्ट के अनुसार जिन बच्चों की मौत छोटे अस्पतालों में या घर पर ही हो गईं, उनके आंकड़े शामिल नहीं किए गए। गैर सरकारी आंकड़ा है कि दो हजार से ज्यादा बच्चे पीड़ित हैं।
गोरखपुर में ठीक, तो मुजफ्फरपुर में क्यों नहीं
यूपी के गोरखपुर में इस से बचाव के लिए टीकाकरण सफलतापूर्वक हुआ, जिससे बीमारी 60 फीसदी तक काबू में आ गई। सवाल यह उठ रहा है कि जब गोरखपुर में टीकाकरण हुआ, तो ऐसा मुजफ्फरपुर में क्यों नहीं हो सका। इंसेफलाइटिस के सबसे ज्यादा शिकार गोरखपुर और मुजफ्फरपुर रहे हैं।
अस्पताल नहीं थे तैयार, बेड कम पड़े
एहतियात बरतने के मामले में लापरवाही सामने आई है। मसलन महामारी हर साल आती है, फिर भी मेडिकल कॉलेज से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अलग से तैयारी नहीं की गई। मेडिकल कॉलेज में मरीजों के बेड तक कम पड़ गए। स्वास्थ्य विभाग अब बारिश के लिए दुआ कर रहा है।
अमेरिका गए, पर इलाज का तरीका नहीं खोजा
लापरवाही की सबसे बड़ी मिसाल यह भी है कि जानलेवा बीमारी के लिए इलाज का क्रम या तरीका (प्रोटोकॉल) तक तय नहीं हो पाया है। 2015 में स्वास्थ्य मंत्रालय के एक्सपर्ट की टीम इस बारे में रिसर्च और इलाज का तरीका तय करने अमेरिका के अटलांटा गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं।
चमकी बुखार से पिछले 24 घंटे में 20 बच्चों की मौत, अब तक 93 मांओं की गोद हुई सूनी

