– दीनानाथ पाटकर।।
अश्वत्थमेकं पिचुमंदकमेकं
न्यग्रोधमेकं दशचिंचिणीकम् ।
कपित्थबित्वामलकत्रयं च पत्र्वाम्रवापी
नरकं न पश्येत।।
– भविष्यपुराण
अर्थात भवविष्यपुराण में लिखा है कि पीपल, नीम और बरगद इनमें से कोई भी एक पौधा, या इमली के दस पेड़ या बेल और आवला इनमें से किसी भी नस्ल के तीन पौधे, या आम के पांच पौधे जो लगाएगा वो नरक जाने से बचेगा।
प्राचीन काल में निसर्ग संपन्न था, जनसंख्या अल्प थी, ऐसे समय में भविष्यकाल की जरूरत ध्यान में रखकर वृक्षों का महत्व समझाने वाले हमारे ऋषि मुनियों को प्रणाम!
बरसो पहले से हमारे देश में कश्मीर से केरल तक अलग-अलग किस्म के वृक्ष पाए जाते हैं। उनकी अपनी अलग पहचान है। हमारे पुराणों में धार्मिक ग्रंथों में उनकी चर्चा की गई है। ये हमारे वृक्ष जैसे पीपल, बरगद, आम, नीम, इमली, आमतलास, कंचन और हजारों भिन्न कद के, प्रकृति के पौधे जो गुंद, लाख, मध और कई औषधियां हमें उपलब्ध कराते हैं। इनके पत्ते पेड़ से गिरने के बाद आसानी से मिट्टी में घुल जाते हैें।
लेकिन ‘गुलमोहर’ जैसे कई पौधे हमारे देश में अंग्रेजों के शासन के दौरान लगाए गए। गुलमोहर को तो कई कवियों ने अपने कविता का विषय बनाया। लेकिन गौर से देखें तो गुलमोहर पौधे पर कोई भी पंक्षी अपना घर नहीं बनाता है। 1840 में पहला गुलमोहर भारत में लाया गया। वही बात नीलगिरि की है। परदेसी पौधों से पर्यावरणीय समतोल बिगड़ सकता है। कुछ साल पहले अर्जेंटीना से भारी मात्रा में गेहूं की आयात की गई। हम गेहूं के साथ ‘पार्थेनियम’ नामक बीज हमारे देश में आया और खेतों में, जंगलों में, तालाबों के आसपास ‘गाजर गवल’ की वजह से नदी, तालाबों का पर्यावरण खतरे में आ गया।
वैसे ही मुंबई-पुणे जैसे शहरों से चिड़ियाों का गायब होना आजकल विशेष चर्चा में है। उसकी वजह शहरों में पहले छोटे घर या 1-2 माले की इमारत हुआ करती थी। इसके इर्द-गिर्द छोटे-छोटे पौधे हुआ करते थे, बेर, बेल, आम, इमली जैसे पौधों की वजह से फल खाना, घोसले बनाना, छोटे-बड़े परिंदों के लिए आसान हुआ करता था।
शहरों में बहुमंजिला इमारतें बनने लगी, छोटे-छोटे घर, 1-2 माले की इमारतें टूटी, उनके साथ पेड़, पौधे बड़ी माज्ञा में काटे गए। पंक्षियों का बसेरा उजड़ता गया और शहरों से कई जाति के पंक्षी जैसे, चिड़िया, हीयाल, बुलबुल गायब होने लगीं। उनकी मधुर चहचहाट गूंज का शहरवासी आनंद उठाया करते थे। अब कार-रिक्शा-मोटरसाइकिल के हार्न के बीच और भागदौड़ भरी जिंदगी के वजह से न तो इस कुदरत के दिए हुए आनंद को आंखों में समा सकते हैं न तो कानों में उनकी गूंज से मन को खुश कर सकते हैं। विदेशी पौधों के भारी मात्रा में शहर में उगाए जाने से यहां के प्राणी और पक्षियों और कीटों का नेचुरल अधिवास नष्ट हो जाता है। उससे बायोडायवर्सिटी की पूरी रचना बाधित हो जाती है। परिणाम स्वरूप कीट को पक्षियों द्वारा होने वाला बीजप्रसार क्षतिग्रस्त होता है और वनीकरण के नैसर्गिक स्रोत कमजोर हो जाते हैं।
अतः पर्यावरणप्रेमियों को इस बात पर ध्यान देकर बाग-बगीचों में देशी वृक्ष भारी मात्रा में लगाए जाने चाहिए। स्कूल-कॉलेज के छात्रों को ऐसे पौधों की जानकारी मिले, इसके लिए विशेष प्रयास करना आज की जरूरत बन गई है। इस बात को ध्यान में लेकर महानगरपालिका राज्य और केंद्र सरकार पर्यावरण का ध्यान रखकर उसको बढ़ावा मिले, इसलिए विशेष प्रयत्न करे, उसके लिए धनराशि उपलब्ध करवाए तो हमारा देश एक बार फिर सुलजाम – सुफलाम हो सकता है।
वृक्षमहात्म्य

