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अमीर लोग अदालत को नियंत्रित करना चाहते हैं: सुप्रीम कोर्ट

Last updated: April 26, 2019 9:55 am
Surabhi Saloni
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6 Min Read
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नई दिल्ली:उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका पर सोच समझकर किए जा रहे हमले पर गुरुवार को नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि अब इस देश के अमीर एवं ताकतवर लोगों को यह बताने का समय आ गया है कि वे आग से खेल रहे हैं और यह रुक जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि पिछले तीन-चार साल से न्यायपालिका से जिस प्रकार पेश आया जा रहा है, वह उससे बेहद नाराज है। जस्टिस अरुण मिश्रा ने तो यहां तक कह दिया कि क्या अमीर और रसूखदार लोग देश और कोर्ट को मनी पावर से चलाना चाहते हैं? उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आग से नहीं खेलें वरना अंगुली जल जाएगी।

पीठ ने कहा, पिछले कुछ वर्षों से जिस तरीके से इस संस्था से पेश आया जा रहा है, उसे देखकर हमें कहना पड़ेगा कि यदि ऐसा होगा तो हम काम नहीं कर पाएंगे। न्यायालय ने कहा, इस संस्था को बदनाम करने के लिए एक सोच समझ कर हमला किया जा रहा है और सोच समझ कर यह खेल खेला जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि मनमाफिक पीठ के समक्ष सुनवाई कराने के आरोप बहुत ही गंभीर है और उनकी जांच की जानी चाहिए।

पीठ ने कहा, न्यायमूर्ति मिश्रा ने पिछले साल न्यायपालिका को विवादों की चपेट में लेने वाली घटनाओं के संदर्भ में टिप्पणी की कि अभी भी सच्चाई सामने नहीं आई है। लोगों को सच्चाई पता लगनी चाहिए। यह सब चल रहा है और इसे बंद करना होगा। क्या देश के धनवान और ताकतवर यह सोचते हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट को रिमोट से कंट्रोल कर सकते हैं। इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि पिछले साल 12 जनवरी को शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों -न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए प्रेस कांफ्रेस की थी। इसमे शीर्ष अदालत में मुकदमों के आवंटन सहित अनेक मुद्दे उठाए गए थे। इन न्यायाधीशों ने कहा था कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो देश की सर्वोच्च अदालत को प्रभावित कर रहे हैं।
मालूम हो कि शीर्ष अदालत एक अधिवक्ता उत्सव सिंह बैंस के उन दावों पर सुनवाई कर रही थी, जिसमे प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों में फंसाने के लिए एक बड़ा षड्यंत्र रचे जाने की बात कही गई है।

कौन है जज एके पटनायक 

– वर्ष 1949 को जन्मे जज एके पटनायक ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में स्नातक और कटक से कानून की पढ़ाई की
– वह 2009 से 2014 तक सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रहे। 1974 में उन्होंने ओडिशा हाईकोर्ट में वकालत शुरू की और 1994 में वहीं अतिरिक्त न्यायाधीश बने
– वर्ष 2002 में ओडिशा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायमू्र्ति बनने से पहले वह गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज रहे। मार्च 2005 में पटनायक को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया

इन अहम मामलों की कर चुके हैं सुनवाई  

सौमित्र सेन का मामला : 
कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ लगे फंड के गलत इस्तेमाल के आरोपों की जांच करने के लिए जो कमेटी बनाई गई थी पटनायक भी उसके सदस्य थे। जस्टिस सौमित्र सेन पर महाभियोग लाया गया था जो राज्यसभा में पास भी हो गया था। बाद में सेन ने त्यागपत्र दे दिया था।

2जी स्पेक्ट्रम मामले की सुनवाई : 
2012 में तत्कालीन चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया ने 2जी स्पेक्ट्रम केस की जांच के लिए जिन 2 जजों की बेंच बनाई थी उसमें एके पटनायक भी शामिल थे। इसके अलावा मतदान के दौरान नोटा का वैकल्पिक प्रावधान देने का मामले, आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग मामले की सुनवाई में भी जस्टिस पटनायक सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल रहे।

नदियों को जोड़ो योजना : 
जस्टिस पटनायक ने ही आदेश दिया था कि तय समय में नदियों को जोड़ने की योजना पर काम करने के लिए उच्च अधिकार संपन्न कमेटी का गठन किया जाए। रिटायर होने के बाद उन्हें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की ओर से सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन पद के लिए नॉमिनेट किया गया था।

कोलेजियम सिस्टम पर उठाए थे सवाल :
पटनायक कोलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाकर सुर्खियों में आ गए थे. 2016 में उन्होंने कहा था कि कोलेजियम सिस्टम की वजह से जजों की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। यह गिव एंड टेक की पॉलिसी है। रिटायरमेंट के बाद उन्हें ओडिशा राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया जा रहा था, लेकिन उन्होंने दिल्ली में रहने की इच्छा के चलते यह पद ठुकरा दिया।

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