09.09.2026, बुधवार, लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी के रूप में विख्यात लाडनूं की धरा। जैन विश्व भारती परिसर के सुरम्य वातावरण में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में आयोजित पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का दूसरा दिवस। बुधवार को स्वाध्याय दिवस का समायोजन। सुधर्मा सभा में विराट संख्या में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ। आध्यात्मिक वातावरण।
आचार्यश्री के पदार्पण से पूर्व मुनि विनोदकुमारजी ने तीर्थ और तीर्थंकर के संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वीवृंद ने स्वाध्याय दिवस के संदर्भ में गीत का संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने अनेकांतवाद को परिभाषित किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी सुधर्मा सभा में मंचासीन हुए और नमस्कार महामंत्र का उच्चारण किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने स्वाध्याय दिवस के महत्त्व को व्याख्यायित किया।
युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने दस धर्मों में से आर्जव-मार्दव धर्म पर प्रकाश डाला। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के व्याख्यान क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि परम आराध्य, परम वंदनीय भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का प्रसंग चल रहा है। 27 भवों में प्रथम भव नयसार के नाम से मनुष्य रूप में थे। साधुओं का संग मिला और उन्होंने सम्यक्त्व रत्न की प्राप्ति कर ली और एक दिन अवसान को प्राप्त होते हैं। जो सम्यक्तवी होता है, वह वैमानिक देव गति में जाता है। नयसार की आत्मा ने वैमानिक देव गति में उत्पन्न होता है। मनुष्य जन्म में सुकुल का प्राप्त होना भी विशेष बात होती है। नयसार की आत्मा देव गति से च्यूत होकर पुनः भगवान ऋषभ के पौत्र, भरत चक्रवर्ती के पुत्र मरिचि के रूप में उत्पन्न हुए। लोगों के कल्याण के लिए साधु, महात्मा, आचार्य प्रवचन, व्याख्यान देते हैं। भगवान ऋषभ की देषना हुई तो मरिचि ने उसे सुना और उसके मन में भावना जगी और उसके मन में वैराग्य जागृत हो गया। मरिचि की दीक्षा भी हो गई। परिषहों के कारण उन्होंने साधु संस्था को छोड़कर अलग हो गए। उन्होंने अपना अलग वेष अपनाकर अलग ढंग से साधना करने लगे। भगवान ऋषभ ने मरिचि को भावी तीर्थंकर बनने की घोषणा कर दी तो चक्रवर्ती भरत ने जाकर उनकी वंदना की। इस प्रकार अकेले ही उनका जीवन व्यतीत हो रहा है।
आचार्यश्री ने स्वाध्याय दिवस के संदर्भ में मंगल प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि पर्युषण के सात दिनों के अलग-अलग विषय भी निर्धारित हैं। आज स्वाध्याय दिवस है। साध्वीप्रमुखाजी ने स्वाध्याय के दिवस में बताया है। स्वाध्याय एक खुराक है। साधु-साध्वियों को ही नहीं, श्रावक-श्राविकाओं को भी जितना समय हो सके, स्वाध्याय करने का प्रयास करना चाहिए। पर्युषण के दौरान दोपहर में आगम स्वाध्याय का क्रम भी चल रहा है। स्वाध्याय के द्वारा अपने-अपने आपको ज्ञान के दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है। संयमी जीवन में स्वाध्याय भी एक खुराक है। इसलिए स्वाध्याय का भी अच्छा उपयोग करते रहें। छोटे साधु-साध्वियों, समणियों आदि को अधिक से अधिक समय स्वाध्याय में लगाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने बालसाध्वी पद्मप्रभाजी को दसवेआलियं के कुछ श्लोकों को सुनाने का इंगित प्रदान किया तो साध्वीजी ने उन श्लोकों का उच्चारण किया तो आचार्यश्री ने साध्वीजी को पांच कल्याणक बक्सीस किए।
