विकास धाकड़/मुंबई। बुधवार 09 सितंबर 2026 पर्युषण महापर्व के द्वितीय दिवस को स्वाध्याय दिवस के रूप में सिम्फनी हॉल, अंधेरी में आध्यात्मिक उल्लास एवं श्रद्धा के साथ मनाया गया। कार्यक्रम की मंगल शुरुआत साध्वी श्री जी के नवकार मंत्रोच्चार से हुई।मंगलाचरण तेरापंथ महिला मंडल, खार द्वारा किया गया। इस अवसर पर साध्वीश्री राकेश कुमारी जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डाला।
साध्वीश्री जी ने आगम वाङ्मय का संदर्भ देते हुए बताया कि गौतम गणधर ने भगवान महावीर से पूछा—“स्वाध्यायेन भंते! जीवे किं जणयई?” भगवान महावीर ने स्वाध्याय की महत्ता बताते हुए कहा कि स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है और ज्ञानरूपी तेज के प्रकाश का अभ्युदय होता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार झाड़ू बाहरी गंदगी को दूर करती है, उसी प्रकार स्वाध्याय रूपी झाड़ू अंतर्मन की गंदगी को दूर कर जीवन को पवित्र दर्पण जैसा निर्मल बना देता है।
स्वाध्याय को व्याख्यायित करते हुए साध्वीश्री जी ने कहा कि आत्मा के अस्तित्व की खोज करना ही स्वाध्याय है। ‘स्व-अध्याय’ अर्थात स्वयं का अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। “मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? और कहाँ जाना है?”—इन तीन प्रश्नों की अनुप्रेक्षा करना स्वाध्याय का सार है। उन्होंने कहा कि भौतिकता एवं विलासिता के युग में मनुष्य स्वयं की पहचान करना भूल गया है। स्वाध्याय ऐसा करिश्मा है, जिसकी नियमित आराधना एवं अनुप्रेक्षा से आत्मिक दिव्य ज्योति का प्रस्फुटन होता है।
साध्वीश्री मलय विभा जी ने वक्तव्य में कहा कि क्षण-क्षण जागरूकता एवं अप्रमत्तता के साथ आत्मज्ञान की ओर बढ़ना ही स्वाध्याय है। बार-बार गहरे भावों की प्रेक्षा एवं अनुप्रेक्षा करना ही सही मायने में स्वाध्याय है। ताश के पत्तों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक चोर ने ताश के एक-एक पत्ते की प्रेक्षा-अनुप्रेक्षा करते हुए केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया। किसी भी निमित्त से उत्तम एवं विशुद्ध भाव जागृत हों तो व्यक्ति केवलज्ञान की दिशा में आगे बढ़ सकता है। आत्मा का स्वाध्याय करते-करते व्यक्ति का उत्थान एवं कल्याण संभव है। तत्पश्चात तेरापंथ युवक परिषद एवं मुंबई सभा आदि के पदाधिकारियों द्वारा बिजनेस संबंधी बैनर का उद्धघाटन किया गया। कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वीश्री मलयविभा जी ने किया।
विलेपार्ले {मुंबई} – स्वाध्याय से आत्मिक ज्ञान का होता है अभ्युदय : साध्वीश्री राकेश कुमारी जी

