मुंबई। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी ठाणा-६ के पावन सान्निध्य में तेरापंथ युवक परिषद् द्वारा बारह व्रत कार्यशाला आयोजित हुई।
तेरापंथ भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए विदुषी साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी ने कहा- भगवान महावीर ने दो प्रकार के धर्मो का प्रणयन किया। उन्होंने आदर्श मनुष्य जीवन की आचार संहिता प्रदान की। व्रत स्वयं को बांधना नहीं निखारना है।
मुख्य प्रशिक्षक साध्वी डा. योगक्षेमप्रभाजी ने प्रशिक्षण के क्रम में त्रसजीवों की हिंसा से बचने के उपायों की चर्चा की। उन्होंने कहा- ये व्रत दिखने में बहुत छोटे हैं, पर उनमें अपार शक्ति है। एक श्रावक अपने जीवन में पूर्ण व्रती तो नहीं बन सकता, किंत कुछ ऐसे नियम-उपनियम लेकर जीवन में सीमांकन कर सकता है।
मोटिवेशनल स्पीकर दिलीप जी सरावगी ने अपने वक्तव्य में कहा – बारह व्रत अव्रत आश्रव के महासागर से चुल्लु या प्याले जितनी सीमा का नाम है। एक सम्यक्त्वी श्रावक अव्रत के अथाह जल से स्वयं को सुरक्षित कर देता है।
मंगलाचरण तेरापंथ महिला मंडल से श्रीमती ममता कच्छारा विद्या कोठारी एवं ने किया। तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष हिमांशु गन्ना ने सबका स्वागत किया। कार्यशाला संयोजक मुकेश डूंगरवाल ने आभार ज्ञापन किया। इस कार्यशाला में करीब 65 भाई-बहनो ने बारहव्रती बनने की दिशा में कदम बढ़ाए ।
चेम्बूर में बारहव्रत कार्यशाला आयोजन

