मुंबई। पिछले चालीस वर्षों से अधिक समय से वस्त्र, मेटल, इलेक्ट्रॉनिक और ज्वैलरी बाजार के व्यापारी बंधुओं से मेरा घनिष्ठ संबंध रहा है। बचपन से व्यापारिक माहौल देखा, फिर जीवन बीमा, जनरल इंश्योरेंस और आज एसेट मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए सैकड़ों व्यापारियों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को करीब से समझने का अवसर मिला—और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा अनुभव रहा।
पिछले दस-पंद्रह वर्षों में बाजार में जाना कम हो गया, लेकिन जब भी किसी पुराने व्यापारी भाई से मुलाकात होती है, तो एक बात लगभग हर किसी के मुँह से सुनने को मिलती है-“अब धंधे में पहले जैसा मजा नहीं रहा… मंदी है… ग्राहकी नहीं है… पैसा समय पर नहीं आता… कंपीटिशन बहुत बढ़ गया है।” लेकिन क्या यह बातें नई हैं? बिल्कुल नहीं। यही बातें मैंने आज से तीस साल पहले भी सुनी थीं, जब मैंने एलआईसी का काम शुरू किया था। फर्क सिर्फ इतना है कि समय बदल गया, लेकिन सोच नहीं बदली।
सच कहूँ तो इसी “रोने की आदत” के कारण मैंने बाजार में आना-जाना कम कर दिया और अपने एसेट मैनेजमेंट के काम को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया। आज जो व्यापारी मेरे संपर्क में हैं, वे न केवल अपने व्यापार में अच्छा कर रहे हैं, बल्कि नियमित निवेश के माध्यम से अपनी वेल्थ भी लगातार बढ़ा रहे हैं—और सबसे बड़ी बात, वे संतुष्ट भी हैं।
हाल ही में जैन समाज के प्रतिष्ठित अखबार “शताब्दी गौरव” के संपादक सिद्धराज लोढ़ा से बातचीत में भी यही विषय निकला। उन्होंने भी वही हाल बताया—बाजार में अधिकांश व्यापारी आज भी परेशान हैं। मैंने उनसे सीधा सवाल पूछा—“जब तीस साल से यही स्थिति है, तो लोग यह धंधा बंद क्यों नहीं कर देते?”
उनका जवाब सीधा और सच्चा था—“ये लोग उधार के धंधे में इतने फंसे हैं कि न छोड़ सकते हैं, न सह सकते हैं और न ही किसी से कह सकते हैं।” अब असली सवाल यही है-क्या उधार में व्यापार करना ही समस्या है? नहीं। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां भी उधार में व्यापार करती हैं। फिर वे सफल क्यों हैं? क्योंकि वे प्रोफेशनल तरीके से काम करती हैं।
बड़ी कंपनियां हर साल अपनी पूंजी का 15–20% डायरेक्टर की सैलरी के रूप में निकालती हैं। और उस पैसे को खर्च नहीं करतीं, बल्कि दूसरी मजबूत कंपनियों में निवेश करती हैं—शेयर या म्यूचुअल फंड के माध्यम से। पांच साल में वे अपनी पूरी पूंजी व्यापार से बाहर निकाल लेती हैं। उसके बाद जो भी मुनाफा आता है, वह अतिरिक्त संपत्ति बनता जाता है।
अब सवाल—क्या यह तरीका छोटे व्यापारी नहीं अपना सकते? क्या एक छोटा व्यापारी अपने लिए साल की शुरुआत में सैलरी तय नहीं कर सकता? क्या वह अपने मुनाफे का एक हिस्सा नियमित निवेश के लिए अलग नहीं रख सकता?
यही तो फर्क है, जो व्यापारी केवल धंधा करते हैं, वे जिंदगी भर उलझे रहते हैं। और जो व्यापारी धंधे को प्रोफेशनल बनाते हैं, वे धीरे-धीरे वेल्थ क्रिएटर बन जाते हैं। एक प्रोफेशनल व्यापारी वही है जो अप्रैल में ही तय करता है—इस साल कितना कमाना है, कितना निकालना है और कितना निवेश करना है। वह केवल “आज” नहीं सोचता, बल्कि अगले 10–20 साल की योजना बनाता है। अंत में हर व्यापारी से मेरा एक ही सवाल है, क्या आप जिंदगी भर “मंदी” का रोना रोते रहना चाहते हैं, या अपनी सोच बदलकर समृद्धि की ओर बढ़ना चाहते हैं? क्योंकि सच्चाई यही है, धंधा सब करते हैं, लेकिन वेल्थ वही बनाता है जो सोच बदलता है।
धंधे में रोना बंद करे, प्रोफेशनल बने, वेल्थ बनाएं: भरतकुमार सोलंकी

