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Reading: गोरखपुर जिला जेल में चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ पर ऐतिहासिक चेतना का जागरण, दुर्लभ दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी आयोजित
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गोरखपुर जिला जेल में चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ पर ऐतिहासिक चेतना का जागरण, दुर्लभ दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी आयोजित

Last updated: January 26, 2026 7:26 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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गोरखपुर। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले चौरी-चौरा जनविद्रोह के 105 वर्ष पूर्ण होने तथा 77वें गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा गोरखपुर जिला जेल परिसर में एक दिवसीय ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी एवं बंदियों के साथ संवाद कार्यक्रम का आयोजन प्रातः 10 बजे से दोपहर 4 बजे तक किया गया, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, राष्ट्रप्रेम और ऐतिहासिक मूल्यों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल चौरी-चौरा जनविद्रोह के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करना था, बल्कि कारागार में निरुद्ध बंदियों के बीच राष्ट्रीय चेतना, आत्मगौरव और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों को जागृत करना भी था।
आयोजन की शुरुआत सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला से हुई, जिसमें देशभक्ति गीतों और विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के माध्यम से राष्ट्रप्रेम की भावना को प्रबल किया गया। इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित बंदियों, जेल प्रशासन के अधिकारियों और आमंत्रित अतिथियों को भावविभोर कर दिया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के पश्चात आयोजित संवाद सत्र में महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक एवं महुआ डाबर एक्शन के क्रांतियोद्धा शहीद जफर अली के वंशज डॉ. शाह आलम राणा ने चौरी-चौरा जनविद्रोह के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चौरी-चौरा की घटना केवल एक स्थान विशेष तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उभरे जनआक्रोश और जनचेतना का प्रतीक थी। यह विद्रोह उस दौर में आम जनमानस के भीतर पनप रहे असंतोष और स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा का परिणाम था। डॉ. शाह आलम राणा ने अपने संबोधन में बताया कि 4 फरवरी 1922 को घटित चौरी-चौरा जनविद्रोह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। इस घटना के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया गया, किंतु इसके बावजूद चौरी-चौरा के शहीदों का बलिदान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे ऐतिहासिक प्रसंगों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि वे अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा ले सकें।
प्रदर्शनी इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रही, जिसमें चौरी-चौरा आंदोलन से जुड़े अनेक दुर्लभ एवं प्रमाणिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए। इनमें उस समय के मूल सरकारी अभिलेख, ऐतिहासिक छायाचित्र, ब्रिटिशकालीन समाचार पत्रों की कवरेज, आंदोलन से संबंधित टेलीग्राम संदेश तथा अदालती अभिलेख शामिल थे। इन दस्तावेजों के माध्यम से दर्शकों को चौरी-चौरा आंदोलन की पृष्ठभूमि, घटनाक्रम और उसके परिणामों को समझने का अवसर मिला। प्रदर्शनी को देखने के लिए बंदियों में विशेष उत्साह देखा गया। उन्होंने न केवल दस्तावेजों को ध्यानपूर्वक देखा, बल्कि डॉ. शाह आलम राणा से प्रश्न भी पूछे और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े तथ्यों को जानने की जिज्ञासा व्यक्त की। संवाद कार्यक्रम के दौरान यह महसूस किया गया कि इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज को दिशा देने वाली जीवंत प्रेरणा है। कार्यक्रम के दौरान जेल प्रशासन की भूमिका भी सराहनीय रही। प्रभारी जेल अधीक्षक अरुण कुमार कुशवाहा ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम बंदियों के मानसिक, बौद्धिक और नैतिक विकास में सहायक होते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब बंदी देश के इतिहास, बलिदान और राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से जुड़ते हैं, तो उनमें सकारात्मक सोच और सुधार की भावना उत्पन्न होती है। कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रभारी जेल अधीक्षक अरुण कुमार कुशवाहा द्वारा महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राणा को सम्मानित किया गया। उन्होंने इस ऐतिहासिक और प्रेरणादायी आयोजन के लिए महुआ डाबर संग्रहालय की टीम की भूरी-भूरी प्रशंसा की और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की इच्छा व्यक्त की। समग्र रूप से यह आयोजन न केवल चौरी-चौरा जनविद्रोह की 105वीं वर्षगांठ और गणतंत्र दिवस का स्मरणीय उत्सव बना, बल्कि यह संदेश भी दे गया कि इतिहास से जुड़कर ही वर्तमान को बेहतर और भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है। महुआ डाबर संग्रहालय का यह प्रयास निश्चित रूप से इतिहास संरक्षण, जनजागरण और राष्ट्रप्रेम को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।

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