by Dinesh Kumar
दिवंदत धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म “इक्कीस” सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। 1971 के भारत-पाक युद्ध को आधार बनाकर मात्र 21 साल की उम्र में शहीद हुए सेकंड लिफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर बनी यह फिल्म भले ही युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनाई गई हो लेकिन इसका भावनात्मक पहलू और धर्मेंद्र का अभिनय औरों की तुलना में इक्कीस बनाते हैं। फिल्म में धर्मेंद्र एवं असरानी के अलावा अगस्त्य नंदा, सिमर भाटिया, जयदीप अहलावत, राहुल देव, विवान शाह, सिकंदर खेर, एकावली खन्ना सहित कई कलाकारों ने अभिनय किया है। मडोक फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म “इक्कीस” का निर्देशन श्रीराम राघवन ने किया है।
कहानीः भारतीय फौज से रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदनलाल खेत्रपाल (धर्मेंद्र) अपने कॉलेज कार्यक्रम में हिस्सा लेने तीन दिन के लिए पाकिस्तान जाते हैं, क्योंकि बंटवारे से पहले उनका मूल घर पाकिस्तान के सरवदा में होता है। यहां वे पाकिस्तानी ब्रिगेडियर जान मुहम्मद निसार (जयदीप अहलावत) के घर ठहरते हैं। और यहीं से शुरु होती है फिल्म की असली कहानी। ब्रिगेडियर मदनलाल खेत्रपाल मुहम्मद निसार के घर पहुंचने के बाद उनके परिवार में उनकी पत्नी और बेटी से मिलते हैं। इधर-उधर की बातें होती हैं, परिवार के बारे में बताते हैं और अपने छोटे बेटे का फोटो दिखाकर भावुक हो जाते हैं, कहते हैं – यह तो हमारे लिए हमेशा इक्कीस का ही रहेगा। निसार के माथे पर भी बल पड़ता है, और वह कसमकस में बातें टालते हैं। परदे पर इसके समानांतर एक और कहानी चलती है और वह है लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (अगसत्य नंदा) के फौज में भर्ती होने की कहानी। कैसे उनकी तैयारी होती है, उनके अपने साथियों के साथ कैसी बांडिंग है, और ट्रेनिंग के समय अधिकारियों का उनके साथ कैसा व्यवहार रहता है, बॉर्डर पर क्या-क्या मस्तियां होती हैं, सभी क्या-क्या करते हैं, यह सब परदे पर बखूबी नजर आता है। इसी बीच उनकी छोटी सी प्रेम कहानी पर भी प्रकाश डाला जाता है, जो कॉलेज के दिनों में थिएटर में फिल्म देखने के दौरान उनकी मुलकात किरण (सिमर भाटिया) से होती है, और दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठते हैं। कहानी वर्तमान में आती है, ब्रिगेडियर कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं, और वहीं से जाकर अपने मूल गांव सरवदा भी देखने की इच्छा जाहिर करते हैं जिस पर ब्रिगेडियर निसार कहते हैं, जी हां सर हम वहां भी आपको ले जाएंगे। कार्यक्रम खत्म होता है और मुहम्मद निसार ब्रिगेडियर खेत्रपाल को लेकर सरवदा की तरफ रवाना होता है साथ में उनकी बेटी भी होती है, जो हर मोमेंट को अपने कैमरे में कैद करती रहती है। ब्रिगेडियर मुहम्मद निसार के मन में कसमकस चलता रहता है, लेकिन वह कह नहीं पाते। फिलहाल ब्रिगेडियर खेत्रपाल पाकिस्तानी ब्रिगेडियर मुहम्मद निसार के साथ अपने गांव सरवदा पहुंचकर अपने उस घर में जाते हैं, जहां उनका बचपन बीता है, लोगों से मिलते हैं, सभी उनका बहुत ही अच्छे से स्वागत करते हैं, सब कुछ बताते हैं, दावत होती है और कहानी आगे बढ़ते हुए फ्लैशबैक में जाती है और शुरू होती है युद्ध की कहानी। ब्रिगेडियर मोहम्मद निसार उन्हें उस लड़ाई की कहानी की तरफ भी ले जाते हैं, और अब आगे क्या होता है, यह फिल्म में ही देखें तो अधिक दिलचस्प लगेगा। फिल्म में कई डॉयलाग और सीन्स हैं जो आपके दिल को छू लेंगे, आपकी भावनाओं को झकझोर देंगे। साथ ही बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देंगे। दरअसल वर्तमान में ऐसी फिल्मों की बहुत जरूरत है, जो दुनिया के तनावपूर्ण माहौल में कुछ नरमाहट ला सकें।
अभिनयः अगस्त्य नंदा ने अपनी पहली ही डेब्यू में काफी प्रभावी अभिनय किया है। जबकि सिमर भाटिया को जितना भी स्क्रीन मिला है, उसमें सुंदर तो लगी ही हैं, अभिनय भी बढ़िया किया है। धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की जोड़ी ने कमाल किया है। धर्मेंद्र की संवाद अदायगी और जयदीप अहलावत के एक्स्प्रेशंस ने दिल जीत लिया है। इनके अलावा राहुल देव और विवान शाह अपने किरदार में जान डाला है तो सिकंदर खेर, एकावली खन्ना ने भी अपने हिस्सा का रोल बखूबी निभाया है। बाकी कलाकारों का भी योगदान और अदायगी कहीं से भी 19 नहीं दिखती बल्कि “इक्कीस” ही नजर आती है।
निर्देशनः श्रीराम राघवन के निर्देशन का ही कमाल था कि हर सीन में उन्होंने जान डाली है, एक भी सीन जबरन घुसाया नहीं लगता, कुछ एकाध चीजों को छोड़ दें तो एक-एक फ्रेम बड़ी शिद्दत से डिजाइन किया है। लोकेशन तो हैं ही कमाल। कुल मिलाकार “इक्कीस” लंबे समय तक याद की जाने वाली फिल्म बनाई गई है।
संगीतः फिल्म के अनुरूप ही है। कोई यादगार गीत नहीं है।
फिल्म “इक्कीस” को सुरभि सलोनी की तरफ से 4 स्टार।

