विकास धाकड़/सूरत {गुजरात}। प्रोफेसर साध्वी श्रीमंगल प्रज्ञा जी ने अणुवत चेतना दिवस पर विशाल धर्म परिषद को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा – धर्म के संवर और निर्जरा- ये दो साधन है। श्रावक- जीवन का केन्द्रीय तत्व प्रत है। आज भोगवादी संस्कृति बढ़ती जा रही है, ऐसी स्थिति में व्रतों का अंकुश जरुरी है। व्रत चेतमा वाले व्यक्ति दृढधर्मी होते हैं। वे विषम परिस्थितियों में अपना संतुलन नहीं खोते,हौसले बुलंद रखते है, इस वजह से सफलता हासिल कर लेंते हैं। सम्पूर्ण परिषद को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा- जैन समाज के जागने का समय है, पुलपार्टी, प्री वेडिंग खुले आम् आम शादी आदि के प्रसंग पर शराब की बौतले खुल रही है, पैसे की बर्बादी हो रही है- ऐसी घिनौनी हरकतों पर रोंक लगनी चाहिए। प्रतिष्ठित महावीर के अनुयायी – पथ से भटक रहे हैं, प्रवाहपाती वन रहे हैं,यह शोभनीय नहीं है।
अपने सुख और सुन्दरता के लिए निरीह जन्तुओं से बनें पदार्थों का सेवन कर रहे है, यह चिन्ता का विषय है। आत्मदर्शन के पर्व से प्रेरणा ले, सच्या पथदर्शन लें; प्रदर्शन से बचें यह आवश्यक है-अपनी भावी पीढ़ी को दुःख के गर्त में गिरने से बच्चाएँ, संस्कृति की सुरक्षा करें । प्रेरणा से प्रभावित होकर श्रावक समाज संकल्पित बना। सरदारशहर गंगाशहर नोंखा भीमासर माडसर डुंगरगढ़, लूणकरण सर जज्जु, बीकानेर चोखला, तारानगर राजगढ़ टमकोंर तारानगर काष्ट बोरावड़ किराडा नोहर भादरा सीखमादेसर जुतेहपुर रत्ननगर हनुमानगढ़ गंगानगर आदि थली क्षेत्र निवासियों ने नए अंदाज में मंगलाचरण प्रस्तुत किया,साध्वी श्री ड़ॉ.राजुलप्रभा जी ने अणुव्रत -विचार प्रस्तुत किए। साध्वी वृंद द्वारा अणुव्रत संदर्भ गीत और अणुव्रत हॉस्पिटल कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया,कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी सुदर्शन प्रभा जी ने किया.!

