शताब्दियां याद करेगी गुरुदेव तुलसी कोः मुनि कमल कुमार

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उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि कमल कुमार जी

जैन धर्म के अनुसार यह संसार अनादिकाल से चल रहा है।  जन्म और मृत्यु का क्रम शाश्वत है। जब तक आत्मा समस्त कर्मों से मुक्त नहीं होती तब तक यह क्रम चलता ही रहेगा। संसारी प्राणी चार गतियों में निवास करते हैं। वे निम्न हैं – नरक , तिर्यन्च , मनुष्य और देव इन चारों में मनुष्य गति को सबसे उत्तम माना गया है। क्योंकि मनुष्य गति से ही जीव सिद्ध , बुद्ध , परमात्मा बन सकते हैं। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो अपने कर्मों के अनुसार चारों गतियों में भ्रमण करता रहता है और अगर वह पूर्ण अप्रमंत बन जाये तो पांचवी गति यानि मोक्ष भी जा सकता है। इसलिये कहा जाता है, कि मनुष्य गति की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है।  कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं  कि अपनी ज्ञान और विवेक चेतना के द्वारा मनुष्य गति में रहते हुए भी भगवान तुल्य पूजे जाते हैं, उनमे एक नाम तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाचार्य श्री तुलसी का भी गौरव के साथ बताया जा सकता है।
आचार्य श्री तुलसी ने मात्र ११ वर्ष की अवस्था में दीक्षा लेकर अपने जीवन के अमूल्य क्षणों को ज्ञानाराधना में इस प्रकार नियोजित किया कि मात्र १६ वर्ष की अवस्था में आप एक कुशल अध्यापक बन गये। आपने अनेक साधुओं को अध्ययन करवा कर मनीषी ही नहीं महामनीषी  की श्रेणी तक पहुँचा दिया। आपकी अनेक क्षमताओं को देखकर आपके गुरु कालुराम जी स्वामी ने २२ वर्ष की अवस्था में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। आपकी कर्मजा शक्ति बेजोड़ थी। आपने सुदीर्घ चिंतन और सुश्रम से इस तेरापंथ धर्म संघ को इस प्रकार नये – नये आयामों से सजाया कि युग ही नहीं शताब्दियों भी सदैव आपकी स्मृति करती रहेगी।
जो तेरापंथ धर्म संघ राजस्थान के मारवाड़, मेवाड़, थली, हरियाणा, मालवा संभाग में ही सिमटा हुआ था आज भारत का कोई ऐसा प्रान्त नहीं होगा जहाँ तेरापंथ नहीं पहुंचा और देश के राजनेता, अभिनेता, उद्योगपति पढ़े लिखे दिग्गज लोग भी इस धर्म संघ का अनुशासन देखकर सभी नत – मस्तक हैं ‘देश ही नहीं विदेशों में भी आजकल समणीवर्ग ने इस तेरापंथ की गहरी छवि बना दी है।
तेरापंथ के आचार्य युगीन चिंतन करते रहते हैं, इसलिये यह संघ सदा बहार है वर्तमान में इस धर्मसंघ का नैतृत्व आचार्य श्री महाश्रमण जी कर रहे हैं , जो केवल अवस्था से ही प्रौढ़ नहीं हैं उनका हर चिंतन , अनुभव प्रौढ़ता से युक्त नजर आता है। यह भी आचार्य श्री तुलसी की ही देन है। उन्होंने  अपने रहते ही दो नये पद प्रतिष्ठित किये, महाश्रमण और महाश्रमणी आज दोनों ही सुदूर प्रांतो की, यात्रा करके जन – जन में सदभावना, नैतिकता और नशामुक्ति का प्रचार कर रहे हैं। जिसमे व्यक्ति परिवार समाज और देश हर तरह से समृद्ध और दूसरों के लिये प्रेरणा स्रोत बन सकता है।
आचार्य श्री तुलसी के १०५ वें जन्म दिवस पर शत – शत नमन करते हुए यह मंगल कामना करता हूँ, कि आपके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं को निरंतर स्मृति में रखते हुए संयम पथ पर निर्बाध गति – प्रगति करता रहूँ।

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