जैन धर्म मे महावीर निर्वाण दिवस से प्रारंभ हुई दीपावली

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उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि कमल कुमारजी

पर्वो का अपना विशेष महत्व होता है। पर्वो को मनाने की प्राचीन परंपरा है। हर समाज के अपने अपने पर्व होते है। पर्व को मनाने समाज के प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक होते है। पर्व को मनाने व्यक्ति दूर दूर से अपने व्यवसाय को भी छोड़कर आते है। पर्व से प्रेरणा मिलती है। परिवार समाज से मिलने के साथ कई प्रकार के आपसी कार्य भी सहजता से सम्पादित हो जाते है। जैन धर्म के भी कई मुख्य पर्व है, उनमे एक पर्व है दीपावली । जिसकी शुरुवात भगवान महावीर के निर्वाण से हुई। तीर्थकरों के पांच कल्याणक होते है। च्यवन ,जन्म भगवान महावीर के निर्वाण से हुई। पर्वो का अपना विशेष महत्व होता है। पर्वो को मनाने की प्राचीन परंपरा है। हर समाज के अपने अपने पर्व होते है। पर्व को मनाने समाज के प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक होते है। पर्व को मनाने व्यक्ति दूर दूर से अपने व्यवसाय को भी छोड़कर आते है। पर्व से प्रेरणा मिलती है। परिवार समाज से मिलने के साथ कई प्रकार के आपसी कार्य भी सहजता से सम्पादित हो जाते है। जैन धर्म के भी कई मुख्य पर्व है, उनमे एक पर्व है दीपावली । जिसकी शुरुवात भगवान महावीर के निर्वाण से हुई। तीर्थकरों के पांच कल्याणक होते है। च्यवन ,जन्म दीक्षा , केवल ज्ञान और निर्वाण इन अवसरों पर देवता आकर उत्सव मनाने है। भगवान महावीर का निर्वाण कार्तिक कृष्णा अमावस्या की मध्यरात्रि में पावापुरी में हुआ। उस अंधेरी रात में निर्वाणोत्सव मनाने देवता आये और रत्नों की बरसात की जिससे अंधेरी रात्रि में भव्य प्रकाश हो गया और पावापुरी के लोगों ने घर घर घी के दीप जलाकर उत्सव मनाया । तब से अब तक कार्तिक अमावस्या को भगवान का निर्वाण दिवस बड़े ही उल्लास के साथ सकल जैन समाज मनाया करता है।
भगवान महावीर जैन धर्म के इस अवसर्पिगी काल के चौबीसवें तीर्थकर हुए। जिनका जन्म बिहार के क्षत्रिय कुंड नगर में माता त्रिशला पिता सिद्धार्थ के घर मे चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को हुआ। जिन्होंने यौवन अवस्था मे दो दिन के उपवास में दीक्षा स्वीकार की। उन्होंने लगभग साढ़े बारह वर्ष तक घोर तपस्या की तपस्या काल मे मौन ध्यान का विशेष क्रम था। भगवान की तपस्या का वर्णन सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते है। तपस्या का क्रम दो दिन से लेकर उत्कृष्ट छह महीनों तक चला सारी , तपस्या चौविहार थी । अर्थात भोजन फल तो दूर रहा पानी भी सेवन नही किया।
साधना काल मे भयंकर उपसर्गो का सामना किया । संगम देव ने एक रात्रि में 20 मार्णान्तिक कष्ट दिए परन्तु महावीर ने उसे समभाव से सहन किया। मनुष्य और तिर्यचो ने भी महावीर की कसौटी करने में कोई कभी कमी नही रखी परन्तु महावीर ने अपनी समता को बनाकर रखा और सब जगह आपकी विजय हुई।
हजारो वर्षो के बाद भी आज उनके सिद्धान्तों की उतनी ही उपयोगिता प्रतीत होती है, जितनी उस समय थी। उनके मुख्य सिद्धान्त अहिंसा , सत्य, अचौर्य , ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह , अनेकांतवाद, आत्म कर्तव्यवाद, समन्वय, सापेक्षवाद, स्यादवाद, संयम आदि है, जिसमे विश्व मे व्याप्त , समस्त समस्याओं का समाधान पाया जा सकता है। भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात उसी रात्रि में गौतम स्वामी को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसलिए दीपावली का और ज्यादा गौरव बढ़ गया। भगवान के 2545 वे निर्वाण दिवस पर सभी को प्रसन्नता निरन्तर बनी रहे और हम भगवान के निर्वाण दिवस को जप तप एवं उनके आदर्शों को अपनाकर निरन्तर मनाते रहे। इसी शुभ एवं मंगलकामना के साथ कोटि कोटि वन्दन ।

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