फ्रांस से राफेल उड़ाने और भारत में पहुंचने में लगे कीमती दो दशक

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सर्वप्रथम  समस्त भारतीयों को  राफेल  की  बहुत बहुत बधाई 

हमारा तक़रीबन दो  दशकों का लंबा इंतज़ार ख़त्म हो गया है। चारों दिशाओं में इसकी मारक क्षमता एवं गति की बात हो रही है, तो दुनिया के दूसरे शक्तिशाली लड़ाकू विमानों के साथ इसकी तुलना की जा रही है। इस बीच, रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि सटीक वार, बेजोड़ ताकत और बहुउद्देशीय भूमिका के लिए दुनिया भर में चर्चित राफेल विमानों से भारत की वायुसेना की क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। खासकर तब जब  हमारे  दो पड़ोसी दुश्मन पाकिस्तान और चीन जैसे  है। इनसे सामना करते समय  राफेल  गेमचेंजर साबित होंगे। चीन के साथ सीमा पर तनाव के मद्देनजर राफेल विमानों के बेड़े में शामिल करने का समय भी बहुत अहम है। वायुसेना के बेड़े में 36 राफेल विमानों को शामिल किया जाना भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि ऐसी दक्षता और बेजोड़ इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली वाला विमान पड़ोस के किसी भी देश के पास नहीं है। वायु रक्षा, बेहद सटीकता से हमले, जहाज रोधी हमले की खासियत समेत इसकी अधिकतम रफ्तार 1.8 मैक है।

अमेरिका के एफ-35 और एफ-22 लड़ाकू विमानों से भी इसकी तुलना की जाती  रही है। पिछले कुछ वर्षों में राफेल ने अफगानिस्तान, लीबिया, माली, इराक और सीरिया में अपना दमखम दिखाया है। फ्रांस, मिस्र और कतर के बाद भारत चौथा ऐसा देश है जिसके पास यह अत्याधुनिक विमान है। राफेल विमान भारतीय वायुसेना की क्षमता को और बढ़ाएंगे। ”36 राफेल विमान आ जाने पर क्षेत्र में भारत के पास बेजोड़ हवाई ताकत होगी। भारत के लिए यह निर्णयकारी भूमिका अदा करेगा। सरकार ने सोमवार को कहा कि सभी 36 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति 2021 के अंत तक हो जाएगी।” वैश्विक बाजार में उपलब्ध यह सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमान है। चीन में उपलब्ध लड़ाकू विमानों की तुलना में यह अत्याधुनिक है और मारक क्षमता भी अधिक है। निश्चित तौर पर भारत की रक्षा तैयारियों को भी इससे बढ़ावा मिलेगा। राफेल के आगमन का समय भी बिल्कुल उपयुक्त है। चीन के लड़ाकू विमान जे-20  कि तुलना राफेल से नहीं की जा सकती क्योंकि फ्रांस निर्मित विमान चीनी लड़ाकू विमान की तुलना में ज्यादा दक्ष है।

राफेल लड़ाकू विमानों के आगमन से हम भारतीय सब प्रसन्न है व गौरवान्वित हो रहे हैं। राफेल से हमारी वायुसेना की मारक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने वाली है बल्कि इस क्षमता वाले विमान न तो चीन के पास हैं और न पाकिस्तान  के पास प्रसन्न होने का यह भी बहुत बड़ा कारण  है, एक कहावत है “गरम दूध ऊपर से मलाई”।

मलाई के स्वाद के बीच हमे यह नहीं भूलना चाहिए की हम रक्षा सौदों में दो दशक से ज्यादा ढिलाई की वजह से कोई भी लड़ाकू विमान खरीद नहीं पा रहे थे। जब 2016 में फ्रांस के साथ 36 राफेल के लिए सौदा हुआ, तब हमें भूलना नहीं चाहिए कि उसे लेकर किस तरह के विवाद हुए थे। राजनीतिक क्षेत्र में किस तरह से चर्चाएं हुई थीं। बहुत अप्रिय ढंग से आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। संभव है, राजनीतिक विवाद न होते और रक्षा सौदों के प्रति हमारे प्रतिष्ठानों में पूरी निष्ठा व तत्परता होती, तो भारत को नए विमानों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।

राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनज़र से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का फैसला आठ-दस साल पहले ही संप्रग सरकार के समय हो जाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने कोई फुर्ती नहीं दिखाई, बल्कि घोर निर्णयहीनता का भी परिचय दिया। इसके चलते राफेल विमानों की आपातकालीन खरीद करनी पड़ी। इस देरी के साथ इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राफेल सौदे को लेकर छल-कपट प्रपंच का सहारा लेकर किस तरह भयंकर दुष्प्रचार किया गया। राहुल गांधी ने तो इस सौदे को संदिग्ध बताने के लिए झूठ की दीवार भी खड़ी कर दी। आखिर उन्हें शर्मिंदगी के अलावा और कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्हें अपने झूठ और अभद्र दुष्प्रचार के लिए सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी। राहुल गांधी के साथ उन लोगों को भी मुंह की खानी पड़ी जिन्होंने मनगढ़ंत आरोपों के सहारे राफेल सौदे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वास्तव में राफेल सौदे को लेकर जैसी स्तरहीन राजनीति दिखाई गई उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। जिन्होंने भी यह  स्तरहीन राजनीति  दिखाई उन्हें नए सिरे से शर्मिंदगी का अहसास ही नहीं होना चाहिए, बल्कि यह जरूरी सबक भी सीखना चाहिए कि:-

राष्ट्ररक्षासमं पुण्यं, 

राष्ट्ररक्षासमं व्रतम्,

राष्ट्ररक्षासमं यज्ञो, 

दृष्टो नैव च नैव च।।

नभः स्पृशं दीप्तम्…

 इस श्लोक का अर्थ है… राष्ट्र रक्षा से बढ़कर ना कोई पुण्य है, न कोई व्रत, ना ही कोई यज्ञ है, आकाश के दीप्‍तिमान स्‍वागत है।

सोचिये हमने राष्ट्र की सुरक्षा और सेना के साथ कैसा खिलवाड़ किया है। पिछली सदी में सुखोई विमान खरीदे गए थे। अब 23 साल बाद राफेल मिला है, तो भारत में इसके मानसिक-सामरिक महत्व को समझा जा सकता है। अव्वल तो भारतीय गगन में एक असुरक्षा का भाव आने लगा था, पुराने पड़ चुके मिग विमानों की दुःखद स्थिति आए दिन रुलाने लगी थी। ऐसे विमानों को उड़ाने की जरूरत पड़ रही थी कि जिन्हें उड़ते ताबूत तक कह दिया जाता था। बेशक, अब राफेल के आने के बाद हम अपनी वायुसेना के और उज्ज्वल भविष्य की ओर देख सकेंगे। सुखोई-30 जैसे विमान अभी भी सेवारत हैं, लेकिन सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें राफेल या उससे भी विकसित 200 से ज्यादा विमानों की जरूरत है। और अभी तो पांच विमानों के साथ शुरुआत हुई… इसलिए सजग रहिये २००+ की पूर्ति आने में सादियां न निकल जाये।

आदित्य तिक्कू।।

 

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