इनकी भूख हमारा भविष्य न बन जाए

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आदित्य तिक्कू।।
खामोशी से दूरी नापती जनता चली जा रही है, भूख मिटाने आयी  थी और भूखी वापस जा रही है। एक विश्वास है कि हम आखरी  सांस से पहले हम अपने घरो तक पहुंचेगे । इनके संग हो रहे सड़क हादसे सिर्फ शर्मनाक ही नहीं,  बल्कि अमानवीय भी हैं। ऐसे हादसे लोगों की पीड़ा  को पहले से ज्यादा गंभीर और गहरे कर जाते हैं।
अपनी जन्म भूमि को छोड़ के यहां सब काम करने आये थे फिर यह वापस क्यों जा रहे है ? इन्हे रोका क्यों नहीं गया ?  क्या इनके बिना राष्ट्र आत्मनिर्भर हो पायेगा ? सरल वह स्पष्ट उत्तर है नहीं। इन्हे  गांव लौटने से अगर रोकना है तो आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों को गति देने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। इस मामले में केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों को भी सक्रियता दिखानी होगी। राज्य सरकारों को खास तौर पर कामगारों को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि उनकी रोजी-रोटी के लिए उपजा संकट फिर खत्म होने वाला है और उन्हें अनिश्चित भविष्य की चिंता के चलते गांव लौटने की जरूरत नहीं। कामगारों को भरोसे में लेने का काम इसलिए प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि ऐसी भी स्थिति बन सकती है कि जब कल-कारखानों में काम शुरू हो तो उनकी कमी ना महसूस की जाये। चूंकि इस कमी के आसार दिखने लगे हैं इसलिए कामगारों की शहर वापसी के लिए नए सिरे से जतन करने पड़ सकते हैं। वैसे कारखानों में काम शुरू होने में समय लगेगा पर तैयारी तो करनी पड़ेगी हर एक हाथ और पेट को संभालना पड़ेगा।
अब कोरोना संक्रमण के आंकडे़ जितनी चिंता पैदा कर रहे हैं, उससे कहीं बड़ी चुनौती भी दर्शा रहे हैं, जो भारत दो महीने पहले कोरोना संक्रमण में दुनिया में चालीसवें स्थान पर भी नहीं था, वह नौवें स्थान पर पहुंच गया है, तो हमें न केवल पीछे बल्कि आगे की ओर भी ज्यादा मुस्तैदी व चौकसी से देख लेना चाहिए। कहीं न कहीं कुछ कमी रह गई है, जिसका आकलन हमारी निगाहों में आने से छूट गया है। ऐसी कौन-सी रियायत व कौन-सी मजबूरी थी, जिसने हमें संक्रमण की ओर बढ़ाया ? और अब तो यह सवाल सताने लगा है कि विशाल आबादी वाला भारत जब नौवें स्थान पर पहुंच गया है, तो कोरोना की यात्रा का समापन कहां होगा ? एक दिन में रिकॉर्ड 7,466 मामलों का सामने आना हमें चौंका रहा है, तो हमें स्वयं से भी कुछ सवाल करने पड़ेंगे। क्या हममें से प्रत्येक की कोई न कोई जिम्मेदारी नहीं है? जो लोग सुरक्षित हैं, वे कब तक और किस हद तक सुरक्षित रह पाएंगे ? आपदा के समय क्या ऐसे कटु सवाल स्वाभाविक नहीं हैं? ऐसे सवालों से हमें डरना कतई नहीं है, हमें तो जवाब खोजना है और समाधान में अपनी हिस्सेदारी निभानी है।
सोचिये और कुछ कीजिये यह पलायन करने वाले वही लोग है जिनके कारण हम आज भी आराम से जीवन व्यतीत कर रहे है। इन्ही के परिश्रम के फलस्वरूप ही हम विश्व में फिर से खड़े होने की स्थिति में आ सकते  है,  इन्ही के कारण ऐसी भयावह स्थिति में व्यापार का और आर्थिक सुदृणता के बारे सोच पा रहे है। इन्हे रोकिये अन्यथा इनकी आज की भूख हमारा भविष्य  न बन जाए।

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