कहानीः ‘न’ से नेता

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पापा मैं कॉलेज जाकर आगे की पढ़ाई करना चाहता हूँ। ठेले पर अंगीठी जलाते हुए मैंने पापा से कहा। सुबह-सुबह दिन निकलने से पहले ही मैं और पापा मेन बाज़ार में ठेला लगाते थे। ठेले पर सुबह की चाय से लेकर रात तक के खाने का इंतजाम था। सारा दिन कड़ी मेहनत के बाद गुजारे लायक कमाई हो ही जाती थी। मेरे पिता ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उन्हें ये तो पता था कि उनका बेटा पढ़ने में बहुत होशियार और होनहार है। स्कूल की पढ़ाई बंद होने के बाद आगे पढ़ने की दबी हुई इच्छा आज मैंने पापा के सामने जाहिर कर ही दी।
रात को घर पहुँच खाना वगैरह खाकर पापा ने मम्मी को अपने इकलौते बेटे की इच्छा के बारे में बताया और रात भर खुद को मेरी पढ़ाई बंद कराने के लिए कोसते रहे और इसी उधेड़ बुन में कि फीस का इंतजाम कैसे होगा पापा की आँख लग गयी। सुबह मम्मी चाय लेकर आयी और पापा से बोली-”फिर क्या सोचा आपने? आगे भेजोगे इसे पढ़ने?”
तभी मैं अंदर आया और रुआंसा सा होते हुए ठेला लगाने को पापा के साथ चलने को कहा। सारे रास्ते मैं और पापा चुपचाप चलते रहे। मैं अच्छे से जानता था कि ठेले से होने वाली कमाई से बड़ी ही मुश्किल से गुजारा होता था हमारा।
“कब तक फीस भरनी है बेटे तूने ?- पापा ने पूछा। “पापा अभी हैं 6 महीने। क्या आप भेजोगे मुझे कॉलेज ?”-बहुत उत्साहित होते हुए मैंने पापा से पूछा। “पता नहीं। तुम्हें तो हमारे हालात के बारे में सब पता है। कैसे इंतजाम होगा? खैर देखते हैं आगे भगवान् कुछ रास्ता निकालता है तो- पापा ने धीमी आवाज़ में कहा। एडमिशन की तारीख से एक हफ्ते पहले अचानक पापा ने मेरे हाथ में एक चेक दिया और बोले -”इतने में हो जाएगा न तुम्हारा एड्मिशन”?
मैं आवाक सा मुहँ खोले पापा की तरफ देख रहा था। “लेकिन इतने पैसे कहाँ से आये”?- मैंने कहा।
“अपनी F.D. तोड़ दी हैं और पेंशन वाले अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए हैं। खैर तुम ये सब छोड़ो और कॉलेज जाने की तैयारी करो। टाइम बहुत कम है। सुबह निकल जाना शहर के लिए “-पापा ने कहा।
मैंने पापा को गले लगा लिया और उनके हाथ चूम लिए। पापा ने अपनी गाढ़ी कमाई व अपने बुढ़ापे के लिए बचाया हुआ सारा पैसा मुझ पर लगा दिया था। घर पहुँच अपना सामान पैक कर सुबह निकलने की तैयारी करने लगा। माँ ने कुछ खाने का सामान बाँध कर साथ रखने को कहा।
“माँ …पापा अब ठेले का काम कैसे संभालेंगें? -मैंने चिंता से कहा। “तू बेफिक्र होकर जा। मैं जाउंगी अब तेरे पापा के साथ। वैसे भी ४-५ साल में कहीं न कहीं तेरी नौकरी हो जायेगी तो सब ठीक हो जाएगा “-माँ बोलीं। मम्मी पापा दोनों मुझे ट्रेन में बिठा कर साथ में मेरे और अपने भविष्य के सुनहरे ख्वाब लिए घर वापिस चले गए। स्टेशन से मैं सीधा कॉलेज पहुंचा और फीस जमा कर हॉस्टल में अपने कमरे में पहुँचा। शाम को कमरे के बाहर सभी नए लड़के इकठ्ठा थे। सभी निम्न वर्ग से थे व बहुत मेहनत से यहाँ पहुंचे थे। सब बहुत लगन से पढ़ते थे। मेरे नंबर भी बहुत अच्छे आते थे और मुझे विश्वास था कि कॉलेज पास करके एक अच्छी नौकरी तो मुझे मिल ही जायेगी। माँ- पापा रात दिन मेहनत कर मुझे कॉलेज की फीस भेज रहे थे।
४-५ साल पलक झपकते ही बीत गए। ये मेरा आखिरी साल था और अब मेरी कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। बहुत ही अच्छे नम्बरों से पास हुआ था मैं। एक हफ्ते बाद कॉलेज में आयी कई कम्पनीज में प्लेसमेंट के लिए मेरा इंटरव्यू था। तभी फोन बजा। दूसरी तरफ पापा थे। बहुत खुश थे पापा।
“बेटा बस कुछ दिनों की बात है। तुम्हारी नौकरी हो जायेगी तो हमारे दिन भी फिर जायेंगें”-मम्मी ने भी फोन पर बात करते हुए कहा।
“हाँ मम्मी बस मुझे आशीर्वाद दो कि मैं इंटरव्यू में पास हो जाऊं”-मैंने ख़ुशी से कहा और फोन रख दिया। तभी कॉलेज के गेट से लड़कों का हजूम हाथ में हॉकी व डंडे लिए अंदर आता दिखा। लड़के जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। थोड़ी देर में ही हॉस्टल के सामने मंच लग गया और लड़के धरने पर बैठ गए। नेता बने लड़के हॉस्टल के सभी लड़कों को जबरदस्ती अपने साथ बिठाने लगे। मुझे भी खींच कर जबरदस्ती मंच पर बिठा दिया गया। मुझे कंपनी के लिए इंटरव्यू की तैयारी करनी थी। मैंने पढ़ाई के अलावा इस तरह के किसी भी कार्य में कभी हिस्सा नहीं लिया था।
पर मंच के सामने लगे कैमरा और मीडिआ द्वारा इस धरने के बारे में इंटरव्यू लिए जाने लगे। मेरी फोटो भी एक-दो दिन से टी,वी में आ रही थी। एक-दो दिन में ही सारा हॉस्टल मेरा नाम जान गया था। मुझे वी.आई.पी ट्रीटमेंट मिलने लगा। लड़कों ने मुझसे प्रभावित हो कर अपने कन्धों पर उठा लिया और अपना नेता घोषित कर दिया। मुझे भी मजा आ रहा था। एक-दो दिन में इतनी आसानी से मिलने वाली पहचान ने मेरे अंदर एक अलग ही जोश भर दिया था। नेता लड़कों व कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन के बीच मामला बिगड़ गया था और कॉलेज के प्रिंसिपल ने कॉलेज का माहौल खराब करने के कारण पुलिस में हम सब की कंप्लेंट कर दी।
मैं कॉलेज आने का अपना उद्देशय व माँ-पापा के अरमान तथा सपनों को भूल चूका था। हॉस्टल के सभी लड़के आज मंच की तरफ न जाकर इंटरव्यू के लिए कॉलेज के हाल की तरफ जा रहे थे। आज कम्पनीज में प्लेसमेंट थी और नौकरी के ऑफर लेटर मिलने थे।
पूरी रात नेता लड़कों के साथ मंच पर बैठे रहने से सुबह मेरी आँख ही नहीं खुल रहीं थीं। मेरी इंटरव्यू की कोई तैयारी नहीं थी। तभी हॉस्टल के वार्डन ने मुझे नीचे बुलाया। नेता लड़कों के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर पुलिस की गाड़ी में बिठा लिया गया। कॉलेज ने हम सब नए-नए नेताओं को रेस्टीगेटे कर दिया और हमारे पेरेंट्स को खबर कर दी गयी और सबको पुलिस स्टेशन पहुँचने को कहा।
शाम को माँ-पापा पुलिस स्टेशन में जुर्माना भरते हुए, हाथ में कॉलेज से मिलने वाले नौकरी के ऑफर लेटर की जगह मेरे रेस्टीगेशन का लेटर लिए मेरे पास आये और मुझे अपने साथ वापिस चलने को कहा। मेरा सुनेहरा भविष्य दाँव पर लग गया था। दो -चार दिन के लिए मैं नेता तो जरूर बन गया था। अपना नाम कमाने के दुष्चक्र में मैं उन नेता लड़कों के झांसे में आ गया था। जिनका नौकरी व पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं था। पूरा हॉस्टल मुझे नेता जी कहकर पुकार रहा था। मेरी जिंदगी के कीमती ५-६ सालों के साथ-साथ मेरे व माँ-पापा के सपने अँधेरे गर्त में चले गए थे। माँ-पापा के सफेद पड़े चेहरे मुझसे देखे नहीं जाते थे। मैं अपने माँ-पापा के लिए कुछ भी न कर सका और मंच पर चापलूसों से घिर कर बैठ मैं रात-दिन मीडिआ में इंटरव्यू देकर एक विशाल आंदोलन का संचालन कर रहा था। मैं उस दिन इन नेता लड़कों को “न” नहीं कर पाया और इस नहीं वाले “न” से मैं नेता बन गया। सुबह माँ ने मुझे ढाँढस बँधाते हुए पापा के साथ ठेला ले जाने को कहा। आज मुझे मालूम पड़ा एक होनहार विद्यार्थी व एक ज़िम्मेदार नागरिक बनना कितना कठिन है और नेता बनना कितना आसान था।
– दीपा डिंगोलिया , रोहिणी ,दिल्ली

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