संत रविदास जयंती विशेष; हमारा मन पवित्र होगा तो हमें भगवान की कृपा मिल सकती है

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9 फरवरी को माघ मास की पूर्णिमा और संत रविदास की जयंती है। संत रविदास से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। इनकी कथाओं का संदेश यही है कि अगर हमारा मन पवित्र है तो हमें भगवान की विशेष कृपा मिलती है। रविदासजी जूते बनाने का काम करते थे। उनसे जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार एक दिन उनके पास एक व्यक्ति आया, उसने कहा कि मेरा जूता फट गया है, इसे जल्दी सही कर दो, मुझे गंगा स्नान के लिए जाना है। वह रविदासजी के भक्ति भाव से परिचित नहीं था। संतश्री ने उस व्यक्ति के जूते सही कर दिए। व्यक्ति ने एक कौड़ी देते हुए कहा कि ये लो तुम्हारी मेहनत का दाम। रविदासजी ने कहा कि आप गंगा नदी तक जा ही रहे हैं तो ये कौड़ी मेरी ओर से मां गंगा को अर्पित कर देना।

व्यक्ति ठीक है बोलकर गंगा नदी की ओर चल दिया। कुछ ही देर में वह नदी पहुंच गया और नदी में स्नान के बाद वह बाहर आ गया। कुछ देर बाद उसे याद आया कि रविदास की एक कौड़ी नदी को अर्पित करनी है। उसने कहा कि हे गंगा मां ये कौड़ी रविदास ने अर्पित करने के लिए कहा है। ये कहते है वहां देवी गंगा प्रकट हुईं और कहा कि ये कौड़ी मुझे दे दो। देवी ने भेंट स्वरूप सोने और रत्नों से बना एक कंगन उस व्यक्ति को दिया और कहा कि ये रविदास को दे देना। व्यक्ति कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह कंगन लेकर वहां से चल दिया। रास्ते में उसने सोचा कि इस कंगन के बारे में रविदास को कुछ नहीं बोलूंगा तो उसे कुछ मालूम नहीं होगा। मैं ये कंगन राजा को दे देता हूं, राजा से उपहार में स्वर्ण मुद्राएं मिल जाएंगी। ये सोचकर वह व्यक्ति राजमहल पहुंच गया और राजा को कंगन भेंट में दे दिया। राजा ने उसे फलस्वरूप बहुत सारा धन दे दिया। धन लेकर व्यक्ति अपने घर की ओर लौट गया।

राजा ने वह कंगन अपनी रानी को दिया। रानी ने कहा कि ये कंगन बहुत सुंदर है, मुझे दूसरे हाथ के लिए भी ऐसा ही एक कंगन और चाहिए। राजा ने तुरंत ही सैनिकों को उस व्यक्ति के पास भेजा और कहा कि ऐसा ही एक कंगन और राजा के दो, वरना तुम्हें दंड भोगना पड़ेगा। ये सुनते ही उस व्यक्ति की हालत खराब हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक कंगन और राजा को कैसे देगा?

बहुत सोचने के बाद वह रविदास के पास पहुंचा और पूरी बात बता दी। उसने अपने किए गलत काम के लिए क्षमा भी मांगी। रविदास ने कहा कि अगर तुम मुझे पहले बता देते तब भी मैं वह कंगन तुम्हें ही दे दता, मुझे धन का कोई लोभ नहीं है। दूसरे कंगन के लिए मैं मां गंगा से प्रार्थना करूंगा, ताकि तुम्हारा संकट दूर हो सके। रविदासजी ने अपनी कठौती, जिसमें चमड़ा गलाने के लिए पानी भरते थे, उसमें ही मां गंगा का आव्हान किया। देवी गंगा वहां प्रकट हुईं रविदास को एक और कंगन दे दिया। संत रविदास ने वह कंगन उस व्यक्ति को दे दिया। इसी के बाद ये कहावत बनी कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।

प्रसंग की सीख

इस प्रसंग की सीख यह है कि अगर हमारा मन पवित्र होगा तो हमें भगवान की विशेष कृपा मिल सकती है। पवित्र मन की वजह से रविदास के एक आव्हान पर देवी गंगा उनके सामने तुरंत प्रकट हो गई थीं।

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