जहां हर चीज सांप्रदायिक हो जाती है, शायर कैसे बचेंगे

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मशहूर शायर।।
फैज अहमद फैज की शायरी सियासी सरहदों से ऊपर उठकर लोकप्रिय रही है, क्योंकि उनकी शायरी आम-अवाम के दुख-दर्द और हक की बात करती है। उसे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बांटकर नहीं देखा जा सकता। फैज साहब पाकिस्तान से हमेशा नाराज रहे, क्योंकि वहां तानाशाहों की हुकूमत रही, मुल्लों-कठमुल्लों का जोर रहा। वह कम्युनिस्ट थे, जिन्हें मजहबी लोग नास्तिक मानते हैं। फैज कभी पाकिस्तान में ठीक से रह नहीं पाए, कभी बेरूत रहे, कभी फलस्तीन तो कभी सोवियत रूस रहे, जहां वह ट्रांसलेशन करते थे।
हमारे देश के जो मौजूदा हालात हैं, उसमें हर चीज को सांप्रदायिक बनाए बिना सियासतदानों का काम नहीं चलता और नफरत इस देश में आजकल ऑक्सीजन का काम करती है। फैज की मशहूर नज्म हम देखेंगे इसी कम्युनलाइजेशन और नफरत का निशाना बना दी गई है। अगर यही नज्म फैज की बजाय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ या हरिवंश राय बच्चन ने लिखी होती, तो इस पर कोई हंगामा नहीं होता। फैज साहब पाकिस्तान के शायर कहलाते थे। हालांकि जब 1911 में वह पैदा हुए थे, तब पाकिस्तान था ही नहीं। वह हिन्दुस्तान में पैदा हुए थे और खुद को हिंदुस्तानी समझते थे। सियासत ने हिन्दुस्तान के टुकड़े करवाकर दुनिया के नक्शे में इसका आकार छोटा कर दिया। हम अक्सर सोचते हैं कि अगर यह पाकिस्तान न बना होता, तो कुछ सरकारें यहां पैदा ही न होतीं, कुछ लीडर तो पैदा होते ही खत्म हो जाते। बहुत सी चीजों को मखमल पर नहीं पाला जा सकता। वे जहालत और नफरत में ही पैदा होती हैं और उन्हीं में तमाम होती हैं।
हम देखेंगे  नज्म की छोटी सी कहानी यह है कि फैज ने इसे पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक की तानाशाही के खिलाफ लिखा था। जिस जुबान में यह लिखा गया है, उसको समझने वाले पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, दोनों में हैं। इसे खासतौर पर इन दोनों देशों में इसलिए पसंद किया जाता है कि इंकलाब को आवाज देने वाले, सच बोलने वाले, रातों को सड़क पर बैठकर एजिटेशन करने वाले, ऐसे तमाम लोग इससे अपने अंदर ऐसी आग पैदा करने की कोशिश करते हैं, जो भूख, गरीबी, अत्याचार को जलाकर खत्म करती है।
इस नज्म में आए ‘बुत’ और कुछ अन्य शब्दों पर बावेला मचा हुआ है। आईआईटी, कानपुर के प्रबंधन ने अपने कैंपस में इस नज्म के गाने को लेकर जांच बिठाई है कि इसमें हिंदुओं की धार्मिक भावना को आहत करने वाली कोई चीज तो नहीं है? अब बुत का मतलब होता है सनम यानी महबूब। वह पत्थर की मूरत, जिसकी सूरत इंसान जैसी हो या वे लोग, जो हर मौसम में अपने आप को पत्थर की तरह चुपचाप खड़ा रखते हैं। बुत का दूसरा मतलब है वह प्रेमिका, जो मोहब्बत के सवाल पर खामोश आंखों से तका करती है। रावण का पुतला भी बुत ही है, जिसे नफरत का सिंबल मानकर जलाया जाता है। अगर कोई नफरत फैलाता है, तो उसका बुत गिरा दिया जाता है। इस नज्म में बुत का इस्तेमाल किन्हीं देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लिए नहीं हुआ है। इसमें ‘अर्जे खुदा’ का जिक्र है, जिसका मतलब है जमीन का खुदा। यह जमीन खुदा की है, लेकिन इस पर रहने वाले कुछ लोग खुद को खुदा समझने लगते हैं और जुल्म करते हैं। नज्म ऐसे ही लोगों की बात करती है। यह बुत जिया-उल-हक के लिए आया था, किसी देवी-देवता के लिए नहीं। फैज की शायरी में कहीं एक भी पंक्ति हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं है।
आईआईटी, कानपुर के बच्चों ने अगर फैज की यह नज्म पढ़ी, किसी प्रोटेस्ट में पढ़ी, तो हमें यह समझना चाहिए कि हर स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटी में अलग-अलग विचारधारा के लोग रहते हैं। किसी विचारधारा की आलोचना तो हो सकती है, लेकिन किसी पर कुछ थोपा नहीं जा सकता। मैं आईआईटी प्रबंधन से कहना चाहता हूं कि यह शायरी है, इसका फैसला गालिब, मीर और तुलसी-कबीर के वंशजों को करने दीजिए। आप इंजीनियर पैदा कर सकते हैं, मगर शायर पैदा नहीं कर सकते। एक मिसाइल बनाने के लिए 30-40 साइंटिस्ट एक साथ काम करते हैं। लेकिन अयोध्या की छोटी सी रियासत के राजा रामचंद्रजी को भगवान लिखना और पूरी दुनिया से मनवा लेना, यह काम तुलसीदास ही कर सकते थे, कोई मिसाइल बनाने वाला नहीं कर सकता। मैं विनम्रतापूर्वक यही कहना चाहता हूं कि इसमें असल मसला सियासत का है। जिस बात का आरोप नज्म पर लगाया जा रहा है, वह उसमें कहीं है ही नहीं। फैज का ही एक शेर है- वो बात सारे फसाने में जिस का जिक्र न था/ वो बात उनको बहुत ना-गवार गुजरी है।

Thanks:www.livehindustan.com

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