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कालबादेवी तेरापंथ भवन में पर्युषण महापर्व के चौथा दिन वाणी संयम के रूप में मनाया गया

मुंबई। साध्वी श्री अणिमा श्रीजी एवं साध्वी श्री मंगलप्रज्ञा जी के सांनिध्य में महाप्रज्ञ पब्लिक स्कूल के विशाल हॉल में पर्युषण का चौथा दिन वाणी संयम दिवस के रूप में समायोजित हुआ। विशाल जनमेदिनी ने वाणी संयम को जीवन सूत्र बनाने की बलवती प्रेरणा को आत्मसात किया। साध्वी श्री अणिमा श्रीजी ने अपने प्रेरक उदबोधन में कहा वाणी के संयम को मौन कहते है। मौन से नई ताजगी व नई स्फूर्ति का दर्शन होता है। अंतर्मुखी बनकर ही मौन को साधा जा सकता है। मौन अपने आप मे शक्ति का भंडार है। वाणी संयम का दूसरा रूप है, विवेक पूर्वक बोलना पहले सोचना फिर बोलना जो व्यक्ति कम बोलता है, सोचकर बोलता है। मधुर बोलता है, वह सबके दिलों में अपना स्थान बना लेना है। वाणी के कारण कुछ लोग दिल मे उतर जाते है। हमे दिल से नही दिल मे उतरना है, उसका साधन वाणी संयम ही है। वाणी संयम की महत्ता को समझे एवं आचरण में उतरे तभी जीवन की दशा  व दिशा बदलेगी।
साध्वी श्री मंगलप्रज्ञा जी ने मंगल प्रेरणा देते हुए कहा हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। आत्मा की पवित्रता अगर यह लाभ केंद्र में रहा तो व्यक्ति वह सब कुछ पा सकता है। जो पाने की इच्छा है। अध्यात्मय को जीवन मे अवतरित किए बिना आत्मा पवित्रता की दिशा प्रशांत नही हो सकती अंत अपेक्षा है, जीवन के हर पथ में अध्यात्म का अनावरण हो। डॉ साध्वी सुधाप्रभाजी में कहा हम अपने विवेक देवता को जगाए। कम बोले काम का बोले व प्रिय बने । संयमित वाणी जीवन का आभूषण बने मधुर भावी बनने का संकल्प ही नही अभ्यास करें। साध्वी मैत्रीप्रभाजी ने मंच संचालन करते हुए कहा व्यक्ति दर्पण में अपना मुख देखकर चेहरे की मलिनता , गन्दगी आदि को साफ करके सुंदर बनने का प्रयास  करना है। हमारा  अंतकरण भी एक मुख है। उसे  चेतना के दर्पण में देखने का प्रयास करना चाहिए।  आत्म निरीक्षण ही दर्पण है। साध्वी स्मतव्यशाजी ने कहा भगवान महावीर की वाणी हमारी चितभूमि, भावभूमि व मनोभूमि को पवित्र उज्ज्वल व निर्मल बनाती है। दादर व एलफिंस्टन महिला मंडल ने मंगल संगान किया । यह जानकारी दक्षिण मुंबई मीडिया प्रभारी नितेश धाकड़ ने दी।

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