आत्मस्थ पुरुष आचार्य भिक्षु -शासन श्री साध्वी श्री सोमलता जी

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डोम्बिवली। ज्ञान-सागर आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी शिष्या शासन श्री साध्वी सोमलता जी के सान्निध्य मे सिंह पुरुष आचार्य भिक्षु को सैकडो भाई बहिनो ने जप तप से कुसुमान्जली अर्पित की , महिला मण्डल ने भिक्षु स्तुति गान किया।
शासन श्री साध्वी सोमलता जी ने कहा- आज भिक्षु स्मृति दिवस है। लेकिन ऐसा कोई दिवस नही है जिस दिन भिक्षु को याद नही किया जाता, क्योकि भिक्षु हमारे रोम-रोम में बसे हुए है। आपने आगे कहा है- आचार्य भिक्षु निर्भीक ओजस्वी और आत्मस्थ योगी पुरुष थे। उनका प्रातिभ ज्ञान अप्रतिम था। उनके ज्ञान दर्पण में जो तत्व प्रतिबिंबित हुए वे अलौकिक थे। उन्होंन कहाे धर्म सब के लिए है वह किसी व्यक्ति विशेष का नही। धर्म सब कर सकते है उसके लिए कोई विशेष स्थान नही लेकिन भावो की निर्मलता चाहिए। आपने आगे कहा आचार्य भिक्षु सत्य को पाना चाहते थे। सत्य का मार्ग फुलो का नही शूलो का होता है। फिर भी उन्होने शूलो का मार्ग अपनाया और सत्य से साक्षात्कार किया। आज हम उनके चरम दिवस को मौनं जप-तप से मनायें और उनके सिद्धांतो को पढकर आत्मस्थ करे।
साध्वी संचितयशा जी ने कहा आचार्य भिक्षु महायोगी थे क्योकि उनकी योग साधना आत्मतेज को प्रगट करती थी। साध्वी जागृतप्रभा जी ने कविता प्रस्तुत की। साध्वी शकुन्तला कुमारी जी ने मौन भावो से प्रस्तुती दी। संजय खाब्या ने स्वर लहरियो से श्रोतागण को भावविभोर कर दिया कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी श्री रक्षितयशा जी ने किया।

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