ललितशेखरविजयजी महाराज ने बताई ‘परिग्रह की भयानकता’

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मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में ठाकुरद्वार में नेमानी वाड़ी के प्रांगण में आज पं. ललितशेखरविजयजी म. सा. ने ‘परिग्रह की भयानकता’ विषय पर प्रवचन दिया। उपाध्याय यशोविजयजी म. सा. ने दुष्कृत की निंदा में 18 पापस्थानकों में 5वां महा-पाप परिग्रह को बताया हैं। परिग्रह यानी आवश्यकता से ज्यादा इकट्ठा, एकत्रित या संग्रह करना, जो वृत्ति या प्रवृत्ति आत्मा को चारों तरफ से अपनी तरफ केंद्रित करती हो या खींच के रखती हो उसे परिग्रह कहते हैं। हमारी आत्मा ने अनंतकाल से आहार संगना, भय संगना और मैथुन संगना से हमारे संसार की वृद्धि की और संसार को टिकाए रखने के लिए परिग्रह संगना की ज़रूरत पड़ती हैं। संतुष्टि जीव को परिग्रह का पाप नहीं लगता, दुर्योधन असंतोषी था इसलिए दुर्गति हुई। जरूरत से ज्यादा की चाह रखने वाले को परिग्रह का भयानक पाप लगता हैं, मम्मण सेठ परिग्रह की वजह से नरक में गया। ज़रूरत से ज्यादा हो पर इसमें मुर्छया का भाव नहीं हो तो परिग्रह का पाप नहीं लगता।
आवश्यकता के लिए दौड़ाना ज़रूरी होता हैं, पर उससे आगे बढ़ते हुए साधन-सुविधाओं के लिए दौड़ने लगे, फिर ऐश्वर्य-वैभव के लिए दौड़ने लगे फिर अहंकार के पोषण के लिए दौड़ने लगे और फिर अभिप्राय (प्रशंशा) के लिए भी दौड़ने लगे। किसी भी वस्तु को लेकर हमें संतुष्टि नहीं होती और परिग्रह के भयानक पाप का शिकार बनते जाते हैं। वस्तु को पाने की इच्छा के कारण अगर वो मिल गयी तो अनीति का पाप, फिर हमें मिली और दूसरों को नहीं मिली तो अहंकार का पाप, पुरुषार्थ करने पर ना मिले तो अतृप्ति का पाप, अपेक्षा से कम मिला तो तृष्णा का पाप, मेहनत करने पर हमें नहीं मिला और दूसरों को मिला तो ईर्ष्या का पाप, मिला हुआ वापिस ना जाये इसलिए आसक्ति का पाप और दुर्भाग्य से मिला हुआ वापिस चला जाये तो दुर्ध्यान का पाप लगता हैं।
जरूरत से ज्यादा संपत्ति एकत्रित करने में परिग्रह का पाप तो लगता ही हैं पर उस संपत्ति की 4 उपमा बताई गई हैं, 1. सुगंधि मूल जैसी जो जमीन में गाढ़कर या लॉकर में रखी हुई संपत्ति के मालिक के मर जाने पर व्यर्थ हो जाती हैं और वो किसी और के काम आती हैं, लक्ष्मीदास की उपमा। 2. चमेली के झाड़ जैसी जिसपे फूल आते है पर फल नहीं आते, शेर बाजार, बैंक डिपॉजिट्स, इत्यादि संपत्ति जो सिर्फ दिखती हैं और किसी काम की नहीं होती, लक्ष्मीदास की उपमा। 3. केले जैसी जो उपभोगनिय होती हैं, खाओ, पीओ और मौज करो, संपत्ति को व्यय कर देना, लक्ष्मीपति की उपमा। और 4. आम के जैसी जो खाने के बाद गुठली में से फिर नया फल देता हैं और परंपरा चालू रहती हैं हमेशा, जो संपत्ति जरूरत जितनी उपभोग में लेकर जरूरत से ज्यादा वाली सुकृत में लगाई जाती हैं वो भवों भव मिलती रहती हैं और भवों भव सुकृत में लगाते जाते हैं, लक्ष्मीनंदन की उपमा। जिसकी तृष्णा जितनी विशाल होती हैं शास्त्रों में उसे उतना बड़ा दरिद्र बताया गया हैं।
झीलवाड़ा संघ के विमलचंद नार, प्रकाश कोठारी, राजू कोठारी, धर्मेश कोठारी, बाबूलाल राठौड़, मनौर सिसोदिया, मोदीलाल सिंघवी, भेरूलाल सिंघवी, लक्ष्मीलाल कोठारी, जगदीश राठौड़, महेंद्र सिसोदिया, विनोद राठौड़, वालू राठौड़, कमल राठौड़, विकास राठौड़, राजू राठौड़, शत्रु कोठारी, जीतू बोहरा, जेठमल कोठारी, विक्रम कोठारी, प्रदीप कोठारी, मोदीलाल कोठारी, रमेश बोहरा, आर्यन राठौड़, हेमू नार, आदि गुरुभक्त गुरुदेव के दर्शन-वंदन और खमत खामणा करने पधारे।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार मेवाड़ मू. पू. संघ, ठाकुरद्वार के धर्म प्रेमी गुरुभक्त खमत खामणा करने पधारे, आचार्य गुरुदेव ने धर्म लाभ देकर गुरु सेवा समर्पण भाव की प्रेरणा दी, मांगलिक के बाद वासक्षेप डाला।
वहीं चांदमल सिंघवी, हिम्मतलाल पामेचा, अम्बालाल संघवी, प्रवीण राजावत, नरेंद्र सिंघवी, कीर्ति पामेचा, हस्ती सिंघवी, चंदू पामेचा, चन्द्रकान्त पामेचा पियुष सिंघवी, मितेश सिंघवी, रमेश पामेचा, गणेश सिंघवी, केतन चंडालिया, सचिन पामेचा, चन्दाबाई सिंघवी, कन्कुबाई सिंघवी, सुकनबेन सिंघवी, भावना सिंघवी, निकिता पामेचा, संगीता सिंघवी, भावना पामेचा, पूजा पामेचा, तानसी सिंघवी, आदि की मुख्य उपस्तिती रही।

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