भारत 10 साल में सबसे कम खर्च में सफल स्पेस मिशन भेजने वाला दुनिया का सुपर पावर बना

0
58

अनिरुद्ध शर्मा।।
  इसरो का चंद्रयान-2 आज रात चंद्रमा पर लैंड करेगा। मिशन 22 जुलाई को लॉन्च किया गया था। चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरेगा। यहां पहुंचने वाला भारत पहला देश होगा। इस मिशन में इसरो वैज्ञानिक 10 साल से जुटे हैं। उन्होंने खुद ही लैंडर और रोवर बनाया।
भारत ने 10 साल में एक के बाद एक सबसे कम खर्च में 20 से ज्यादा सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं। इनकी लागत दुनिया में अन्य देशों के मिशनों के खर्च की तुलना में आधे से कम रही है। ऐसा इसरो ने देश के युवा टैलेंट पर भरोसा और विदेशी वैज्ञानिक बुलाना बंद करके किया है। इन मिशनों को बहुत ही कम समय में पूरा किया है। चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट पर 978 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। यह हाल में आई हॉलीवुड फिल्म एवेंजर्स-एंडगेम की लागत से कम है। इसके निर्माण में 2560 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। 2014 में भारत ने मंगल की कक्षा में मंगलयान भेजा था। मिशन मंगलयान पर 532 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। जबकि 2013 में नासा द्वारा मंगल पर भेजे मावेन ऑर्बिटर मिशन में 1346 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।
मुश्किल: 2013 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने इसरो को लैंडर देने से मना कर दिया था
1 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा कि वह इसरो के चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में साथ काम करेगा और लैंडर देगा। 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया। जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर दे पाने में असमर्थता जताई। इसके बाद इसरो ने लैंडर विक्रम को खुद ही बनाया।
कामयाबी: अमेरिका, रूस, चीन ही अब तक चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करा सके हैं
2 इसरो का चंद्रयान-2 मिशन अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में भारत को नया कद देेगा। अब तक दुनिया के सिर्फ 3 देश ही चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करा पाए हैं। ये देश- रूस, अमेरिका और चीन हैं। भारत, जापान और यूरोपीय यूनियन ने इससे पहले चंद्रमा  पर अपने मिशन भेजे हैं। लेकिन चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर सके हैं। िसर्फ कक्षा में ही पहुंचे हैं।
मिशन का मकसद : चंद्रमा पर पानी और जीवन तलाशना, चंद्रयान-3 की दिशा-दशा तय करना
चंद्रयान-2 का मकसद, चंद्रमा पर खनिज, पानी, जीवन की संभावना तलाशना है। ऐसी खोज करना, जिनसे भारत के साथ पूरी दुनिया को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही 2023-24 के भावी चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट में नई टेक्नोलॉजी की दिशा-दशा तय होगी। चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम जहां उतरेगा उसी जगह पर यह जांचेगा कि चंद्रमा  पर भूकंप आते हैं या नहीं। वहां थर्मल और गुरत्वाकर्षण कितनी है। रोवर चंद्रमा के सतह की रासायनिक जांच करेगा कि तापमान और वातावरण में आर्द्रता है कि नहीं। अमेरिका के स्पेस एंड ओसियन स्टडीज प्रोग्राम से जुड़े चैतन्य गिरी कहते हैं कि भारत ने एशिया में कम बजट में सैटेलाइट और अंतरिक्ष मिशन भेजने की छवि बनाई है। 2017 में भारत ने रिकार्ड 104 सैटेलाइट एक साथ अंतरिक्ष में भेजे थे।
रोवर चंद्रमा की सतह पर तिरंगे की छाप छोड़ेगा

  • इसरो का टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क चंद्रयान-2 के संपर्क में हैं। इसरो सेंटर में वैज्ञानिक शांत हैं। एक वैज्ञानिक ने कहा, सब के दिल में यही चल रहा है कि क्या होगा, इसलिए सब चुप हैं।
  • शनिवार तड़के जब चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह से 35 किमी पर होगा, तब नीचे लगे पांचों इंजन ऑन कर दिए जाएंगे। अंतिम समय में गति शून्य कर दी जाएगी और यह बिना हलचल के चंद्रमा पर उतर जाएगा।
  • रोवर के चंद्रमा की जमीन पर उतरते ही वह लैंडर और लैंडर रोवर की सेल्फी लेगा। रोवर जब लुढ़कता हुआ चंद्रमा पर उतरेगा तो सतह पर भारतीय तिरंगे और इसरो के लोगो के निशान छोड़ता जाएगा।

दुनिया के देश जो चंद्रमा पर सैटेलाइट यान भेज चुके हैं 
रूस: 1959 से 1976 के बीच सोवियत संघ रूस ने 24 प्रयास किए, इनमें से 15 सफल रहे, किसी में ऑर्बिटर था, किसी में लैंडर। 13 सितंबर, 1959 को रूस का लूना-2 मिशन चंद्रमा पर पहुंचने वाला पहला मिशन था। लूना के दो मिशन चंद्रमा की सतह से नमूने लेकर भी वापस आए। लूना-17 और लूना-21 मिशन ने चंद्रमा पर रोवर को भी उतराने में कामयाबी हासिल की।
जापान: जापान ने 24 जनवरी, 1990 को अपना पहला मून मिशन ‘हितेन-हागोरोमो’ लाॅन्च किया। ऑर्बिटर से चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के कुछ देर बाद ही इसका जमीन से संपर्क कट गया। जापान एयरोस्पेस एजेंसी ने 4 सितंबर 2007 को ‘कागुया’ लाॅन्च किया, जो 3 अक्टूबर को चंद्रमा  की कक्षा में पहुंच गया। अपोलो मिशन के बाद चंद्रमा का यह सबसे बड़ा मिशन था।
अमेरिका:  नासा के सर्वेयर प्रोग्राम के तहत जून, 1966 से जनवरी, 1968 तक 7 बार रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा पर भेजे गए। इनमें से पांच सर्वेयर स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग में सफल रहे। नासा के अपोलो मिशन के तहत फरवरी, 1966 से दिसंबर, 1972 के बीच 19 प्रयास किए, 16 सफल रहे। इन मिशनों के जरिए नील आर्मस्ट्रांग सहित 24 अंतरिक्ष यात्री भीचंद्रमा पर पहुंचे।
चीन: चीन के चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ने मून मिशन चेंग सीरीज में 2007 से अब तक 4 प्रयास किए हैं, सभी सफल रहे हैं। चेंग-1 और चेंग-2 में ऑर्बिटर भेजे गए और चेंग-3 और चेंग-4 में लैंडर थे, इनमें युतु-1 और युतु-2 नाम के रोवर भी थे। चेंग-3 (1200 किग्रा) लैंडर ने चीन से एक दिसंबर, 2013 को उड़ान भरी और 14 दिसंबर को चंद्रमा पर उतर गया।
भारत:  भारत का चंद्रयान-1 (1380 किग्रा) 22 अक्टूबर, 2008 को पीएसएलवी सी-11 रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा से भेजा गया। इसमें कुल 11 उपकरण थे। इसकी अवधि 2 साल थी, पर यह केवल 10 महीने छह दिन ही सक्रिय रह सका।
यूरोप की यूरोपियन: यूरोप की यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने स्मार्ट-1 ऑर्बिटर/इंपैक्ट प्रोब 27 सितंबर, 2003 को लाॅन्च किया।

Thanks:www.bhaskar.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)