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पन्द्रवही शताब्दी में बना था पशुपतिनाथ मंदिर

नेपाल की राजधानी काठमाण्डू स्थित विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर का हिंदु धर्म में एक अहम स्थान है। पशुपतिनाथ मंदिर के विषय में माना जाता है कि यह वेद लिखे जाने से पहले ही स्थापित हो गया था। इस मंदिर का निर्माण सुपुष्पा देवा, लिच्चावी के राजा ने पन्द्रवही शताब्दी में करवाया था। पशुपतिनाथ मंदिर वागमती नदी के तट पर स्थित है। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है।
इस मंदिर को केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग, नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में स्थित है। 12 ज्योतिर्लिंगों को भगवान् शिव का शरीर माना जाता है और पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग को सिर।
पशुपतिनाथ का मंदिर हिन्दू धर्म के 8 प्रमुख धार्मिक स्थानों में से भी एक है। शिव पुराण के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग मनुष्य की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम है।
माना जाता है कि नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है जो लोहे को भी सोना बना देने का गुण रखता है।
भगवान् पशुपतिनाथ की मूर्ति
मुख्य मूर्ति एक मुखलिंग के रूप में है। एक मीटर ऊंचे लिंग के चार मुख हैं। चारों दिशाओं में एक-एक मुख और एक मुख ऊपर की ओर है जो अलग-अलग दिशाओं एवं गुणों का परिचय देते हैं।
प्रत्येक दिशा के मुख के दायें हाथ में रुद्राक्ष की माला एवं बाएं हाथ में कमंडल है। पूर्व दिशा वाले मुख को तत्पुरुष, पशिम दिशा के मुख को सद्ज्योत, उत्तर दिशा के मुख को वामदेव और दक्षिण दिशा के मुख को अघोरा कहते हैं।
मंदिर का इतिहास
वर्ष 2015 में नेपाल में आये विनाशकारी भूकंप के कारण मंदिर के बाहरी भाग की कुछ इमारतें ध्वस्त हो गयी थीं किन्तु मुख्य गर्भ गृह को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।
मंदिर के पंडित
इस मंदिर की एक ख़ास बात यह है कि मुख्य मूर्ति को केवल ४ पुजारी ही हाथ लगा सकते हैं। मंदिर की दैनिक पूजा का जिम्मा दो प्रकार के पंडितों पर है- पहले हैं भट्ट पुजारी और दुसरे हैं भंडारी। इनमें से केवल भट्ट पंडितों को मूर्ति को हाथ लगाने का और पूजा का अधिकार प्राप्त है। भंडारी पंडित भट्ट पंडितों की मदद के लिए नियुक्त हैं और वो न मूर्ति को हाथ लगा सकते हैं और न ही पूजा करने का अधिकार उन्हें प्राप्त है।
भट्ट कर्नाटक (भारत) के वैदिक ब्राह्मण पंडित होते हैं। अन्य हिन्दू मंदिरों की तरह पशुपतिनाथ के पंडित अनुवांशिक नहीं होते। यहाँ के पंडित शृंगेरी के दक्षिणामनय पीठ के शंकराचार्य द्वारा शिक्षित पंडितों में से ही चुने जाते हैं।
तंत्र विद्या का केंद्र
पशुपतिनाथ मंदिर को तंत्र विद्या का प्रमुख केंद्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि चारों वेदों के सिद्धांत भी यहीं से निकले हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में साक्षात शिव जी निवास करते हैं।
पशुपतिनाथ मंदिर को तंत्र विद्या का प्रमुख केंद्र माना जाता है
मुख्य मंदिर के भीतर केवल हिन्दुओं को ही प्रवेश की अनुमति है।
दर्शन के नियम
इस मंदिर के दर्शन के विषय में मान्यता है कि मंदिर में नंदी के दर्शन से पहले ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से कभी पशु योनी में जन्म नहीं होता है। किन्तु यदि कोई भक्त ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पहले नंदी के दर्शन करता है तो उसका जन्म पशु योनी में होना निश्चित है। इस प्रकार मानव योनी में बार- बार जन्म पाने के लिए भी इस मंदिर के दर्शन का महत्व है।

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