अपने मन की भी सुनें और आगे बढ़ते हुए अपनों को साथ रखें

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*. कई बार मन करता है कि काश, हम कुछ बीती चीजें बदल पातें। कुछ चीजों को बिगड़ने से रोक लेते, कुछ बातों को सुधार पाते। पर ऐसा होता कहां है? जो बीत गया, वह बीत ही जाता है। जो करना है, आज में करना होता है। लेखिका लोरी डेशने कहती हैं, ‘कार में आगे का शीशा, पिछले से बड़ा ही होता है। पीछे क्या छूट गया, उससे जरूरी यह जानना है कि हम आगे कहां बढ़ रहे हैं।’

*. जीवन में कुछ अपनों का होना जरूरी है। उन लोगों का, जो हमारा अच्छा-बुरा समझते हैं। हमारे साथ खड़े होने के लिए तैयार होते हैं। यूं भी जेब भरा होना ही काफी नहीं होता। लेखक जी.एम लॉरेंस कहते हैं, ‘जीवन में आपके पास क्या-क्या है, इससे जरूरी यह है कि आपके साथ कौन-कौन है।’

*. हम सबकी सुनते हैं, बस अपनी ही नहीं। एक बार सुनें तो खुद ही पता लग जाएगा कि क्या खाना अच्छा है, किन लोगों के साथ रहना है और किन्हें छोड़ देना सही है। कितना काम करना है और कब काम को विराम देकर कुछ समय अपने, दोस्तों और प्रकृति के साथ बिताना है। समस्या यह है कि हम अपने भीतर की नहीं सुनते और न ब्रह्मांड की उस परम सत्ता की, जो जानता है कि हमारी बेहतरी किसमें हैं।

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