बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, दुष्कर्म मामले में हमेशा पीड़िता का बयान भरोसेमंद नहीं

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मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म के मामले में हमेशा पीड़िता के बयान को ही पर्याप्त सुबूत नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने इसी आधार पर 19 साल के युवक को दोषमुक्त करार देते हुए उसकी सजा भी रद कर दी।

जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे की एकल पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता का बयान निश्चित ही ठोस और भरोसेमंद होना चाहिए। अगर पीड़िता का बयान पर पूरी तरह से भरोसेमंद ना हो तो आरोपी को संदेह का लाभ पाने का हक है। पिछले हफ्ते सामने आया यह फैसला जस्टिस मोहिते-डेरे ने पिछले महीने सुनाया था।

यह मामला महाराष्ट्र के ठाणे जिले का है। आरोपी सुनील शेल्के पर दुष्कर्म का आरोप था। दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली लड़की भी उसके गांव की थी और दोनों की शादी होने वाली थी, जो किसी वजह से टूट गई थी।

पीड़िता ने आरोप लगाया था कि मार्च, 2009 में होली के दिन जब गांव के सभी लोग त्योहार मना रहे थे, आरोपी अपने दो साथियों के साथ उसे घर से उठाकर सुनसान जगह पर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इस मामले में एक महीने बाद रिपोर्ट दर्ज की गई थी।

निचली अदालत ने 2014 में सुनील को दोषी करार देते हुए उसे सात सला कैद की सजा सुनाई थी। सुनील ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता यह साबित करने में विफल रही है कि घटनावाले दिन उसके साथ क्या हुआ था। मेडिकल रिपोर्ट में भी उसको चोट लगने की बात नहीं है।

इसलिए सिर्फ उसके बयान को ही भरोसेमंद नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों की शादी होने वाली थी, जो टूट गई थी। रिकॉर्ड में जो सुबूत हैं उससे यह पता चलता है कि घटना से पहले रात में पीड़िता और आरोपी दोनों साथ थे। गांव वालों को भी पता था कि दोनों की शादी होने वाली है। जज ने कहा कि इस सब को देखते हुए पीड़िता और उसके घरवालों द्वारा शादी टूटने पर आरोपी को दुष्कर्म मामले में फंसाए जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी को दोषमुक्त करार देते हुए उसकी सजा भी खत्म कर दी।

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