‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती’

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इस बार मदर्स डे पर मशहूर रचनाकार गुलज़ार, मुनव्वर राणा, निदा फ़ाज़ली और कवि ओम व्यास की मां पर लिखी 4 चुनिंदा नज़्में। ये वह रचनाएं हैं जो देश-काल और तमाम बंधनों से परे हैं…इनका हर एक शब्द मन को गहराई तक छू जाता है। आप भी महसूस कीजिए…

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुंकनी जैसी मां।

बांस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे,
आधी सोई, आधी जागी, थकी दुपहरी जैसी मां।

चिड़ियों के चहकार में गूंजे राधा-मोहन अली-अली,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी मां।

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में,
दिनभर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां।

बांट के अपना चेहरा, माथा, आंखें जाने कहां गईं ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी मां।

                                              – निदा फ़ाज़ली

  1. कितना कूड़ा करता है पीपल आंगन में,
    मां को दिन में दो बार बोहारी करनी पड़ती है।
    कैसे-कैसे दोस्त-यार आते हैं इसके
    खाने को ये पीपलियां देता है।
    सारा दिन शाखों पर बैठे तोते-घुग्घू,
    आधा खाते, आधा वहीं जाया करते हैं।
    गिटक-गिटक सब आंगन में ही फेंक के जाते हैं।
    एक डाल पर चिड़ियों ने भी घर बांधे हैं,
    तिनके उड़ते रहते हैं आंगन में दिनभर।
    एक गिलहरी भोर से लेकर सांझ तलक
    जाने क्या उजलत रहती है।
    दौड़-दौड़ कर दसियों बार ही सारी शाखें घूम आती है।
    चील कभी ऊपर की डाली पर बैठी, बौराई-सी,
    अपने-आप से बातें करती रहती है।
    आस-पड़ोस से झपटी-लूटी हड्डी-मांस की बोटी भी कमबख़्त ये कव्वे,
    पीपल ही की डाल पे बैठ के खाते हैं।
    ऊपर से कहते हैं पीपल, पक्का ब्राह्मण है।
    हुश-हुश करती है मां, तो ये मांसखोर सब,
    काएं-काएं उस पर ही फेंक के उड़ जाते हैं,
    फिर भी जाने क्यों! मां कहती है-आ कागा
    मेरे श्राद्ध पे अइयो, तू अवश्य अइयो !
                                                – गुलज़ार

    लती फिरती आंखों से अज़ां देखी है
    मैंने जन्नत तो नहीं देखी है मां देखी है

    जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
    मां दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

    मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
    मुद्दतों मां ने नहीं धोया दुपट्टा अपना 

    लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
    बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती 

    मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं
    मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

                                               – मुनव्वर राणा

    मां…मां-मां संवेदना है, भावना है अहसास है
    मां…मां जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
    मां…मां रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है
    मां…मां मरूस्थल में नदी या मीठा सा झरना है,
    मां…मां लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
    मां…मां पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,
    मां…मां आंखों का सिसकता हुआ किनारा है,
    मां…मां गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,
    मां…मां झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
    मां…मां मेहंदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है,
    मां…मां कलम है, दवात है, स्याही है,
    मां…मां परमात्मा की स्वयं एक गवाही है,
    मां…मां त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
    मां…मां फूंक से ठंडा किया हुआ कलेवा है,
    मां…मां अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,
    मां…मां जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है,
    मां…मां चूड़ी वाले हाथों के मजबूत कधों का नाम है,
    मां…मां काशी है, काबा है और चारों धाम है,
    मां…मां चिंता है, याद है, हिचकी है,
    मां…मां बच्चे की चोट पर सिसकी है,
    मां…मां चूल्हा-धुंआ-रोटी और हाथों का छाला है,
    मां…मां ज़िंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है,
    मां…मां पृथ्वी है, जगत है, धुरी है,
    मां बिना इस सृष्टी की कल्पना अधूरी है,
    तो मां की ये कथा अनादि है,
    ये अध्याय नहीं है…
    …और मां का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
    तो मां का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
    और मां जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,

                                       – स्व. ओम व्यास

Thanks:www.bhaskar.com

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