फ़िल्म रिव्यू: फोटोग्राफ (रेटिंग-2 स्टार)

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रोज हजारों लोग गेटवे ऑफ इंडिया देखने आते है और कई फोटोग्राफर उनकी तस्वीर खींच जीवन यापन कर रहे हैं । ऐसे ही एक फोटोग्राफर राफिकउल्ला (नवाजुद्दीन सिद्धिकी) की कहानी है ‘फोटोग्राफ ‘।
निर्देशक रितेश बत्रा ने अपनी फिल्म ‘फोटोग्राफ’ गेटवे ऑफ इंडिया को ही ध्यान में रखकर बनाई है । मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) एक गुजराती परिवार की लड़की है जो कॉलेज में टॉपर है और सीए इंट्रेंस की परीक्षा के लिए तैयारी कर रही है । वह पढ़ने में होशियार है पर उसका मन हताश है वह कही न कही अपनी दुनियां में गुमशुदा सी है । ऐसे ही जिम्मेदारी के बोझ से मायूस और खुश रहना भूल चुका फोटोग्राफर रफीक है । दोनों कहीं ना कहीं जीवन से मायूस हैं । अलग अलग परिवेश में रहने वाले ये दोनों अचानक गेटवे ऑफ इण्डिया में मिलते हैं । मिलोनी अपनी माँ और बहन के साथ गेटवे ऑफ इंडिया घूमने आयी है , वहीं फोटोग्राफर रफीक उसे फ़ोटो खिंचवाने को कहता है । मिलोनी फ़ोटो खिंचाने के बाद अपनी तस्वीर देख हतप्रभ हो जाती है और बिना पैसे दिए वहाँ से चली जाती है । इधर रफीक दुखी होता है कि लड़की ने पैसे नहीं दिए ऊपर से उसकी दादी का बार बार उस पर दबाव की वह शादी कर ले । रफीक अपनी दादी को मिलोनी की तस्वीर भेज इस मामले को शांत करने की कोशिश करता है पर तस्वीर देख दादी मुम्बई आने को आतुर हो जाती है । रफीक दुविधा में डूब जाता है कि दादी को कैसे समझाए। तभी उसे पोस्टर में मिलोनी की तस्वीर दिखती है और वह उसे मनाने मिलोनी के पास जाता है, पर हिम्मत नहीं जुटा पाता। आखिर हिम्मत कर वह मिलोनी को सब बताता है । मिलोनी उनकी फोटोग्राफी और मासूमियत से प्रभावित हो उसका साथ देने के लिए तैयार हो जाती है और इस प्रकार उनकी मुलाकातों का सिलसिला शुरू होता है । वे एक दूसरे को जानने लगते है रफीक मन ही मन उसे प्यार करता है पर अपनी हैसियत और मर्यादा को भलीभांति समझता है। मिलोनी के लिये उनकी जिंदगी एक अलग अनुभव का एहसास दिलाती है उसे यह सब अच्छा लगता है । उसके लिये ये नई दुनिया का अनुभव खुशियों भरा होता है और रफ़ीक भी खुश है।
नवाजुद्दीन सिद्दिकी और सन्या एक बेहतरीन कलाकार है, उनकी भावनाओं को बहुत अच्छी तरह निर्देशक ने फ़िल्म में सजाया है । पर नवाजुद्दीन की दादी का किरदार सबसे जानदार है। फ़िल्म की धीमी पड़ती कहानी में वह जोश भरती है और इसके मजेदार पंच दर्शकों को प्रभावित करते हैं।
फ़िल्म की कहानी दर्शकों की समझ के परे है इसे समझने के लिए वक़्त लगेगा । कहानी का उद्देश्य और अंत स्पष्ट नहीं है जो फ़िल्म के लिये कमजोर कड़ी बन सकती है। आर्ट सिनेमा प्रेमियों को यह फ़िल्म पसंद आएगी लेकिन मनोरंजन चाहने वालों को खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा।
– गायत्री साहू

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