प्रियंका और यह प्रहार काल

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शशि शेखर।।
हम वक्त के ऐसे अनूठे दौर से गुजर रहे हैं, जहां हर रोज मीडिया की क्षणभंगुर सुर्खियां आम आदमी की वैचारिक तरंगों पर प्रभाव डालती हैं। अस्थिर अवधारणाओं के इस दौर में सत्य तर्कों की आड़़ी-तिरछी रेखाओं में फंसा नजर आता है और विचारों को प्रवाह के लिए व्यक्तित्वों की जरूरत पड़ती है। अगर प्रियंका गांधी वाड्रा की सक्रिय राजनीति में आमद को इस दृष्टि से देखें, तो तमाम प्रश्न हल होते नजर आएंगे।

राजनीति प्रियंका के लिए अजूबा नहीं है। वह इसी वातावरण में जन्मी, पली और बढ़ीं। प्रियंका जानती हैं कि बदलते समय में नेता की बोलचाल और चाल-ढाल हवाओं का रुख मोड़ सकती हैं। 1999 के आम चुनाव में उनके नजदीकी रिश्तेदार और पिता के बेहद करीब रहे अरुण नेहरू ‘कमल’ पर सवार होकर रायबरेली के चुनावी समर में उतरे थे। कांग्रेस की ओर से प्रियंका ने पहली बार प्रचार की कमान सम्हाली थी। उस वक्त तक राहुल गांधी सीधे तौर पर राजनीति के रथ पर सवार नहीं हुए थे। प्रियंका गांधी के लिए भी जनता से सीधे मुखातिब होने का वह पहला मौका था।

नौजवान प्रियंका ने उसी दौरान रायबरेली की जनता से भावुक अपील की थी कि जिस शख्स ने अपने भाई की पीठ में छुरा घोंपा, क्या आप उन्हें वोट देंगे? इन शब्दों ने अरुण नेहरू को विभीषण साबित कर दिया। और वह इस चुनाव में चौथे स्थान पर आ गिरे।

गांधी परिवार और कांग्रेस के लिए वह कठिन वक्त था। पांच साल तक सत्ता के शीर्ष पर विराजमान रहे नरसिम्हा राव ने ‘परिवार’ के आभा मंडल को कम करने की गूढ़ कोशिशें की थीं। राव के बाद कुछ समय के लिए अफरा-तफरी छा गई थी। वह दौर देवेगौड़ा और इंंद्रकुमार गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों का था। ये दोनों धूमकेतु की तरह थे, अस्थिर और अस्ताचलगामी। संक्रमण के उस दौर में भारतीय राजनीति के सर्वाधिक चमकीले सितारों में से एक अटल बिहारी  वाजपेयी तेजी से शीर्ष की ओर बढ़ रहे थे। उधर, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और मायावती ने कांग्रेस के आकार को सिकोड़़कर रख दिया था। लड़खड़ाती पार्टी का बहुमत सोनिया गांधी में अंतिम आसरा ढूंढ़ रहा था। इन कठिन हालात में मां के चुनाव क्षेत्र में प्रियंका ने बाजी पलट दी थी।

बीस साल बाद गुजरे बुधवार को पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ ईडी दफ्तर की दहलीज तक जाकर उन्होंने फिर जता दिया कि वह जो सोचती हैं, करती हैं। भरोसा न हो, तो कुछ देर बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी मुख्यालय के बाहर उन्होंने जो तीन वाक्य बोले, उसे याद कर देखिए। उन्होंने अकुलाए पत्रकारों से कहा, जो हो रहा है, उसे  दुनिया देख रही है। यह राजनीतिक प्रतिशोध का नतीजा है। मैं अपने पति और परिवार के साथ खड़ी हूं। तय है, वह इस मुद्दे को इसी रूप में देश की जनता के सामने रखना चाहती हैं।

ऐसे में, सवाल उठना लाजिमी है कि सोमवार को जब वह लखनऊ की सड़कों पर बहैसियत कांग्रेस महासचिव उतरेंगी, तो पार्टी को कितना फायदा होगा?

जवाब आसान नहीं है। लंबे समय तक कांग्रेस की दोस्त रही सपा अब बसपा के साथ गठबंधन धर्म निभा रही है। उनका प्रभाव हर गांव-गली तक मौजूद है। भारतीय जनता पार्टी ने भी उत्तर प्रदेश में न केवल बहुमत संपन्न सरकार बनाई, बल्कि अपना संगठन भी काफी मजबूत किया है। ऐसे प्रतिद्वंद्वियों के रहते कांग्रेस के लिए जगह बनाना बेहद मुश्किल है। ऊपर से पार्टी संगठन का शीराजा बिखरा हुआ है। देश के सबसे बड़े सूबे में कांग्रेस को हुकूमत गंवाए तीन दशक हो चले हैं। लाखों मतदाताओं ने तो कांग्रेस विहीन वातावरण में सांस लेना सीखा है। इस वर्ग को प्रभावित करने के लिए पार्टी के पास जमीनी स्तर के नौजवान कार्यकर्ताओं का अभाव है। पकी अथवा पकती हुई आयु वाले रहे-बचे कार्यकर्ताओं का दायरा सीमित है। उन्हें भाजपा के सर्वाधिक कद्दावर राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, केशव प्रसाद मौर्य, दिनेश शर्मा जैसे नेताओं का सामना करना है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश की धरती से जुड़े हुए हैं।

सिर्फ यही नहीं, मुकाबले में नरेंद्र मोदी खुद हैं। वह वाराणसी से सांसद हैं। यह सही है कि भाजपा के लिए 2014 जैसा आकर्षण अब नहीं है, पर उन्होंने सवर्ण आरक्षण और लुभावने अंतरिम बजट के जरिए अपनी साख बचाने की जोरदार कोशिश की है। यही नहीं, भाजपा संगठन के पास अमित शाह जैसा कामयाब अध्यक्ष है। प्रियंका के सार्वजनिक अवतरण से पहले शाह प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में घूम-घूमकर बूथ कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। मोदी जहां सीधे जनता को संबोधित करते हैं, वहीं शाह अग्रिम मोरचे के कार्यकर्ताओं को एकजुट कर बूथ प्रबंधन करते हैं।

जाहिर है, प्रियंका गांधी को किस्म-किस्म की विपरीत परिस्थितियों से एक साथ जूझना है। लक्ष्य कठिन है, पर राजनीति संभावनाओं का खेल है। मैं इस लेख की शुरुआत में अनुरोध कर चुका हूं। इस कठिन वक्त में व्यक्तित्व विचारधाराओं का चेहरा बन रहे हैं। प्रियंका इसका अपवाद नहीं हैं। पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका सहयोग करने के लिए भाषा, विचार और व्यक्तित्व के धनी ज्योतिरादित्य सिंधिया को मैदान में उतारा है। कांग्रेस इन दो चेहरों के दम पर देश के सबसे बड़े सूबे पर दांव लगाने जा रही है। ध्यान दें। पड़ोसी बिहार में तो कांग्रेस के पास ऐसा कोई लुभावना व्यक्तित्व नहीं था, इसके बावजूद पार्टी ने तीन फरवरी को पटना के गांधी मैदान में 28 बरस बाद जितनी भीड़ जुटाई, वह कांग्रेस की जमीनी स्थिति के हिसाब से काफी बेहतर मानी गई। सियासी उलटबांसी है, रैलियां जीत की गारंटी नहीं होतीं, पर भीड़ ही भीड़ को आकर्षित करती है।

पिछले दिसंबर में तीन राज्यों का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस में नई स्फूर्ति का संचार जरूर हुआ है, पर हिंदी पट्टी में उसे अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए बहुत मेहनत करनी है।

Thanks:www.livehindustan.com

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