आत्मस्थ बनने के लिए रहे मध्यस्थ – आचार्य महाश्रमण

  • “शासनमाता” पुस्तक का पूज्यचरणों में विमोचन
  • बायतु मर्यादा महोत्सव की ओर गतिमान धवल सेना

20.01.2023, शुक्रवार, लालुराम की ढाणी, बाड़मेर (राजस्थान)। 52 हजार से भी अधिक किलोमीटर की पदयात्रा कर जन मानस में नैतिकता, सद्भावना एवं नशामुक्ति की अलख जगाने वाले युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी वर्तमान में बाड़मेर जिले में सानंद यात्रा कर रहे है। आज प्रातः आचार्य श्री ने केसुंबला से मंगल विहार किया। सर्द मौसम में भी अपनी आध्यात्मिक ऊष्मा द्वारा श्रद्धालुओं को पावन आशीर्वाद प्रदान करते पूज्यप्रवर गंतव्य की गतिमान हुए। चारों ओर फैले विस्तृत धोरों के मध्य युगप्रधान की धवल सेना मरुधरा में श्वेत हंसों के काफिले की मानों प्रतीति करा रही थी। लगभग 12 किलोमीटर विहार कर शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी लालुराम को ढाणी के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में प्रवास हेतु पधारे। आचार्यप्रवर की सन्निधि में आज तेरापंथ की अष्टम साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा जी के 51वें चयन दिवस पर स्मृति कार्यक्रम भी समायोजित हुआ। लगभग एक वर्ष पूर्व माघ कृष्ण त्रयोदशी को ही लाडनूं, जैन विश्व भारती में अमृत महोत्सव का आयोजन हुआ था जिसमें आचार्यप्रवर ने साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा जी को “शासनमाता” अलंकरण प्रदान किया था। इस अवसर पर शासनगौरव साध्वी कल्पलता जी द्वारा लिखित ‘शासनमाता’ पुस्तक का भी पूज्य चरणों में विमोचन किया गया।
मंगल प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा– समता की साधना सुख की जननी है। अनुकूल-प्रतिकूल व सुख-दुख आदि हर परिस्थिति में कोई समतावान ही सुख में रह सकता है। साधु को तो सदा समता का जीवन जीना ही चाहिए, पर गृहस्थ भी इस दिशा में प्रस्थान करे। मन में कोई राग द्वेष का भाव न उभरे ऐसा प्रयास रहना चाहिए। आत्मस्थ रहने के लिए दो उपाय बताये गए हैं – पहला समता में रहना व दूसरा अपनी चेतना में वास करना। आत्मस्थ रहने के लिए व्यक्ति मध्यस्थ रहे।
प्रसंगवश आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी का मनोनयन दिवस है। आज से 51 साल पूर्व आचार्य तुलसी ने उन्हें यह कार्यभार सौंपा था। वह पहली साध्वीप्रमुखा थी जिन्होंने इतने लम्बे समय तक प्रमुखा पद पर सेवा दी। सबसे लम्बा आचार्य काल आचार्य तुलसी का व सबसे लम्बा प्रमुखा काल साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी का रहा। उन्हें तीन आचार्यों की सेवा करने का योग मिला। उनमें विशिष्ट वैदुष्य था, सृजन शक्ति भी थी। उनके जीवन से प्रेरणा लेने का प्रयास करे।
“शासनमाता” जीवनी पुस्तक के संदर्भ में गुरुदेव ने फरमाया – साध्वी कल्पलता जी को साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी के पास निकटता से रहने का अवसर मिला। पुस्तक आगयी एक अच्छा कार्य संपादित हो गया। साध्वीप्रमुखा का जीवन संस्मरणों का निधान है। पाठकों के लिए पुस्तक प्रेरणा का माध्यम बन सकेगी।
इस अवसर पर मुख्यमुनि महावीर कुमार जी, साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी, साध्वीवर्या संबुद्ध यशा जी ने भी अपने विचारों की प्रस्तुति दी। जैन विश्व भारती की ओर से श्रीमती किरण देवी आंचलिया, श्रीमती शशिदेवी नाहर, श्रीमती कमलादेवी परमार ने शासनमाता पुस्तक पूज्य चरणों में लोकार्पित की।

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