रेतीले टिलों के मध्य बसे गांव ज्योतिचरण से बन रहे पावन

  • 12 किलोमीटर का विहार कर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण पहुंचे परेऊ
  • परेऊ मठ के महंत व ग्रामीण जनता ने किया आचार्यश्री का अभिनंदन
  • जीवन के कल्याण में निमित्त बनती है संतों की संगति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

15.01.2023, रविवार, परेऊ, बाड़मेर (राजस्थान)। राजस्थान के बाड़मेर जिले में गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, मानवता के मसीहा रेतिलों टिलों के मध्य बसे क्षेत्रों में निरंतर गतिमान हैं। 159वें मर्यादा महोत्सव के लिए बायतु की ओर गतिमान आचार्यश्री इससे पूर्व मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी की जन्मभूमि फलसूण्ड को भी अपनी चरणरज से पावन बनाने वाले हैं। आचार्यश्री 18 जनवरी को फलसूण्ड पधारेंगे। उस ओर गतिमान आचार्यश्री रविवार को रावल की ढाणी से प्रातः की मंगल बेला में प्रस्थान किया तो उस समय सर्दी अपने पूरे प्रभाव में थी। आसमान साफ होने के बाद भी वातावरण में व्याप्त शीतलता जनमानस को सिकुड़ने पर मजबूर कर रही थी। सूर्योदय के कुछ समय बाद तक भी सूर्य की किरणों का तेज भी मानों न के बराबर था, किन्तु जैसे-जैसे सूर्य आसमान में ऊध्र्वारोहण करता गया, सर्दी गायब होती चली गई और इस मरुभूमि में सूर्य का ताप महसूस होने लगा। रेतिलों टिलों के मध्य बने मार्ग से गतिमान आचार्यश्री की धवल सेना इस मरुभूमि में धवल धारा के समान प्रतीत हो रही थी। इन टिलों पर उगे बबूल और आकड़े के झाड़ियों ने टिलों को मानों हरा-भरा बनाने का प्रयास कर रहे थे। राजस्थान के राजकीय वृक्ष खेजड़ी भी अपना स्थान बनाए हुए थी।
लगभग बारह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री महाश्रमणजी परेऊ गांव के निकट पधारे तो आचार्यश्री के आगमन से हर्षित परेऊ मठ के महंत श्री ओंका भारतीजी, सरपंच आदि अनेकों ग्रामीणों ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया। महंतजी व ग्रामीणों के साथ आचार्यश्री परेऊ के राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।
विद्यालय परिसर में उपस्थित जनता को आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में निमित्त और उपादान का अपना महत्त्व होता है। जैसे एक घड़े को बनाने का मूल कारण तो मिट्टी होती है, किन्तु सहायक कारण कुम्भकार और साधन सामग्री के बिना घड़े का निर्माण भी संभव नहीं हो सकता। इसलिए मानव जीवन में निमित्त का भी अपना महत्त्व होता है। इसी प्रकार कर्मों की निर्जरा कार्य है तो तपस्या निर्जरा की सहयोगी बनती है, इसमें प्रेरणा का भी अपना सहयोग होता है। इस प्रकार अपने जीवन में उपादान और कारणों की खोज की जा सकती है।
अपने जीवन का कल्याण करने के लिए व्यक्ति को साधुओं की संगति करने का प्रयास करना चाहिए। साधुओं की संगति से सुनने का लाभ प्राप्त होता है। सुनने से ज्ञान मिलता है, उससे विशेष ज्ञान होता है तो फिर जीवन में त्याग, प्रत्याख्यान भी हो सकता है। इससे मानव अपने जीवन का कल्याण कर सकता है। आचार्यश्री की प्रेरणा से उपस्थित ग्रामीणों, विद्यार्थियों विद्यालय प्रबन्धन आदि कार्य से जुड़े लोगों ने सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के संकल्पों को स्वीकार किया।
आचार्यश्री की सन्निधि में उपस्थित परेऊ मठ के महंत श्री ओंकार भारतीजी ने कहा कि परम पावन आचार्यश्री महाश्रमणजी ने यहां पधारकर परेऊ धरा को पावन बना दिया। यह अवसर प्राप्त कर मैं धन्य हो गया। गांव के सरपंच श्री बांकाराम चैधरी ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। श्रीमती टीना श्रीश्रीमाल ने तीस की तथा श्रीमती आशादेवी गोलेछा ने 41 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

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