सहिष्णुता, संतोष, सहयोग व सेवा की भावना बने प्रवर्धमान : वर्धमान प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमण 

  • वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिन आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ पर की आशीषवृष्टि
  • बालोतरा को प्रदान किया पावन आशीर्वाद, चित्त समाधि बनाए रखने की दी पावन प्रेरणा
  • ज्ञानाशाला के ज्ञानार्थियों की अनेकानेक प्रस्तुतियों संग श्रद्धालुओं ने व्यक्त की अपनी भावनाएं

11.01.2023, बुधवार, बालोतरा, बाड़मेर (राजस्थान)। लूणी नदी के तट पर अवस्थित वस्त्रनगरी बालोतरा में धर्म और अध्यात्म की गंगा को प्रवाहित करने तथा जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्धमान महोत्सव जैसे विशेष आयोजन को सम्पन्न करने पहुंचे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अध्यात्म जगत के महासूर्य, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिन चतुर्विध धर्मसंघ को सेवा, सहिष्णुता और शांति में प्रवर्धमान बनने को अभिप्रेरणा प्रदान करते हुए श्रद्धालुओं को ज्ञानरूपी गंगा में डुबकी लगवाई, तो बलोतरा की जनता भावविभोर हो उठी। आचार्यश्री ने लोगों को धर्म की वांछा करने, परन्तु पुण्य की परिकल्पना न करने की भी प्रेरणा प्रदान की।
बालोतरा प्रवास का अंतिम दिन तथा वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिवस पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनमेदिनी को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज बालोतरा में वर्धमान महोत्सव का तीसरा और अंतिम दिवस है। संख्या, गुणात्मकता आदि की वर्धमानता की बातें हुईं, वांछनीय वर्धमानता भी होती रहे। इसके साथ-साथ सहिष्णुता, सेवा, शांति और समता भाव में निरंतर प्रवर्धमानता हो तो स्वयं का जीवन और संघीय अथवा पारिवारिक जीवन भी अच्छा हो सकता है। सहिष्णुता का विकास शारीरिक, मानसिक और वाचिक तीनों रूपों में हो। लोभ के भाव क्षीण हों, संतोष का विकास हो, क्षमा का भाव हो, परावलम्बिता जितनी कम हो सके, परस्पर सामंजस्य और सहयोग की भावना हो। जहां भी जिस प्रकार की उचित सेवा की आवश्यकता हो, उस प्रकार की सेवा की भावना में वर्धमानता हो। हमारे पूर्वाचार्यों से प्रवर्धमानता की प्रेरणा लेकर साधु-साध्वियां, समणियां और श्रावक-श्राविकाएं भी धार्मिक-आध्यात्मिक रूप में प्रवर्धमान बनें।
आज बालोतरा के इस प्रवास का अंतिम दिन है। यह बहुत अच्छा क्षेत्र है। यहां कितनी सेवा, त्याग, तपस्या देखने को मिली है। परस्पर सौहार्द तथा सभी की चित्त समाधि बनी रहे, मंगलकामना।
संतवृंद ने वर्धमान महोत्सव के संदर्भ में गीत का संगान किया। अपनी जन्मभूमि में मुनि पुनीतकुमारजी ने आचार्यश्री के समक्ष आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने महाश्रमण अष्टकम्, छह द्रव्यों पर प्रस्तुति, बारह व्रतों पर प्रस्तुति, कव्वाली की प्रस्तुति, ज्ञानार्थी बालक आरव बालड़, ज्ञानार्थी बालिका इस्वी छाजेड़ ने अपनी-अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। मुमुक्षु बहनों, ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी, सुश्री सैफाली चोपड़ा, युवती मण्डल, तेरापंथ युवक परिषद, तेरापंथ महिला मण्डल व तेरापंथ कन्या मण्डल संयुक्त, श्रीमती शैली गोगड़ व श्री राजेश खिंवेसरा ने पृथक्-पृथक् गीतों का संगान किया। ज्ञानशाला की मुख्य प्रशिक्षिका श्रीमती उर्मिला सालेचा, तेरापंथ कन्या मण्डल संयोजिका साक्षी बेद मेहता व श्री सिद्धार्थ ने पूज्य सन्निधि में अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।

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