मृषावाद के चार कारण : क्रोध, लोभ, भय और हास्य : महातपस्वी महाश्रमण

  • प्रवास के दूसरे दिन जसोलवासियों पर हुई गुरु की महर, जसोल को दिया पावन आशीर्वाद
  • अनेक अक्षम श्रद्धालुओं को दिए दर्शन, संथारारत दंपति सहित अनेक परिवारों के घर भी हुए धन्य
  • साध्वी स्थितप्रभाजी की स्मृतिसभा में चारित्रात्माओं ने दी अपनी श्रद्धांजलि

07.01.2023, शनिवार, जसोल, बाड़मेर (राजस्थान)। जसोल की धरा पर अपने पावन प्रवास के दूसरे दिन जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जसोलवासियों पर महर बरसाते हुए शनिवार को प्रातःकाल भ्रमण के दौरान जसोल के कई अक्षम श्रद्धालुओं को उनके घरों में पधारकर उन्हें दर्शन और आशीर्वाद से अच्छादित किया। आचार्यश्री इस दौरान संथारारत दंपत्ति को आध्यात्मिक सहयोग देने भी पधारे। जसोल भ्रमण करते हुए आचार्यश्री महादानी सालेचा परिवार व भंसाली परिवार के निवास स्थान में पधारे। इस प्रकार आचार्यश्री के जसोल में भ्रमण से अनेकानेक श्रद्धालुओं को अपने-अपने घरों आदि के निकट आचार्यश्री के दर्शन और श्रीमुख से मंगलपाठ का सौभाग्य सहज रूप में प्राप्त हो गया।
वीतराग समवसरण में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनमेदिनी को आचार्यश्री ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि धर्मग्रन्थों में 18 पाप बताए गए हैं। इनको यदि काल की दृष्टि से तीन भागों में बांटा जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य। उदाहरण के लिए अतीत में किया हुआ पाप प्राणातिपात पापस्थान, उसकी प्रेरणा से वर्तमान में किया गया प्राणातिपात प्रवृत्ति और भविष्य में होने वाला बंध प्राणातिपात बंध के रूप में होता है। इसी प्रकार सभी पापों में ये तीनों बातें प्राप्त होती हैं। इनमें एक पाप है मृषावाद। मृषावाद के चार कारण बताए गए हैं- क्रोध, लोभ, मय और हास्य। आदमी क्रोध में होकर झूठ बोल सकता है, लोभ के कारण झूठ बोल सकता है, भय से भी झूठ बोल सकता है तथा किसी से हंसी-मजाक में भी झूठ बोल सकता है। साधु के पांच महाव्रतों में एक महाव्रत है सर्व मृषावाद विरमण। इसके साधु के तीन करण तीन योग से मृषावाद का त्याग होता है। आदमी को भी अपने जीवन में झूठ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। मृषावाद को पुष्ट बनाने के लिए क्रोध, लोभ, मय और अनावश्यक हंसी-मजाक से भी बचने का प्रयास होना चाहिए।
आचार्यश्री ने जसोल आगमन के संदर्भ में कहा कि जसोल में प्रवास का दूसरा दिन है। यहां से धर्मसंघ को अनेक चारित्रात्माएं प्राप्त हुई हैं, एक समणी भी है। वर्ष 2012 के जसोल चतुर्मास को इतिहास दुर्लभ कहने का अर्थ अब स्पष्ट करता हूं कि यहां से हमें साध्वीवर्या प्राप्त हुईं। दीक्षा के चार वर्ष भी नहीं बीते कि साध्वियों एक उच्च पद पर आ गई और उस चतुर्मास में यहां दो चारित्रात्माओं के संथारे भी सिद्ध हुए तो यह उस दृष्टि से सिद्ध चतुर्मास भी हो गया। साध्वीवर्या खूब अच्छा विकास करती रहे। उस चतुर्मास में साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी विराजते थे। अब उनके महाप्रयाण के बाद साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी हैं। उनके बाद साध्वियों में नम्बर दो पर साध्वीवर्या है। जसोल से अनेक साधु-साध्वियां भी जसोल से प्राप्त हुए हैं। उनमें से कुछ गुरुकुलवासी और बहिर्विहारी का विशेष सहयोग भी प्राप्त हो रहा है। गुरुकुलवासी संतों को नजर न लगे लेकिन उनका विशेष सहयोग मिल रहा है। जसोल अच्छा क्षेत्र है। कल यहां ज्ञानशाला के बच्चों द्वारा तत्त्वज्ञान का अच्छा गीत सुनने को मिला। संसारपक्ष मंे जसोल से संबद्ध मुनि विश्रुतकुमारजी और मुनि कीर्तिकुमारजी ने गुरुचरणों में अपनी अभिवंदना अर्पित करते हुए अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। आचार्यश्री ने महादानी सोहनलाल सालेचा व उनकी धर्मपत्नी और परिवार को भी आशीष प्रदान करते हुए कहा कि इन्होंने अपने चार पुत्र-पुत्रियों में से तीन को धर्मसंघ में समर्पित कर दिया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में साध्वी स्थितप्रभाजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए उनकी आत्मा के प्रति मध्यस्थ भाव रखते हुए चतुर्विध धर्मसंघ संग चार लोग्गस का ध्यान किया। वे तेरापंथ धर्मसंघ की समण श्रेणी की प्रथम समणी थी। जिन्हें अंतिम समय में गुरु की आज्ञा से साध्वी दीक्षा भी प्रदान की गई। इस संदर्भ में साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यमुनिश्री, साध्वीवर्याजी ने उक्त आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलभावना व्यक्त की। समणी कुसुमप्रज्ञाजी, समणी अक्षयप्रज्ञाजी, समणी मधुरप्रज्ञाजी, समणी प्रतिभाप्रज्ञाजी, समणी मृदुप्रज्ञाजी, समणी पुण्यप्रज्ञाजी, समणी निर्मलप्रज्ञाजी ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। समणीवृंद द्वारा समूह गीत का संगान किया गया। साध्वी युक्तिप्रभाजी ने भी अपनी भावांजलि अर्पित की।
आचार्यश्री के स्वागत में जसोल के सरपंच श्री ईश्वरचंद चौहान ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए जसोल के एक मार्ग का नाम आचार्यश्री महाश्रमण मार्ग करने की घोषणा की। इस अवसर पर जसोल से संबद्ध मुमुक्षु आयुषी चोपड़ा व मुमुक्षु विनु संकलेचा ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

सानंद गतिमान है संकलेचा दंपति का संथारा
आचार्यश्री महाश्रमणजी के इस जसोल आगमन पर श्री पुखराज संकलेचा के साथ उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गुलाबीदेवी संकलेचा ने संथारा स्वीकार कर लिया। यह तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास की पहला अवसर है जब किसीने सजोड़े अर्थात् पति-पत्नी दोनों ने संथारा स्वीकार कर लिया हो। फिलहाल यह संथारा सानंद गतिमान है। आचार्यश्री शनिवार को उक्त दम्पति को आध्यात्मिक सहयोग देने के लिए उनके घर भी पधारे।

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