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विद्या अनंत, विद्या का हो सदुपयोग : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण 

आचार्यश्री ने भगवती सूत्र के माध्यम से प्राच्य विद्याओं को किया व्याख्यायित

– अनुशासन दिवस : निज पर शासन, फिर अनुशासन का आचार्यश्री ने दिया सूत्र

-जैन विश्वभारती के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने की नवीन टीम की घोषणा

01.10.2022, शनिवार, छापर, चूरू (राजस्थान) : नित्य प्रति अपनी अमृतवाणी के माध्यम से लोगों के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा, यात्रा प्रणेता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की इस अमृतवाणी का रसपान करने के लिए लालायित नजर आ रहा है। तभी तो प्रवचन पण्डाल में उपस्थित श्रद्धालुओं में केवल तेरापंथी या जैनी लोग ही नहीं, हर वर्ग, जाति के लोग नजर आते हैं। वे इस महामानव से मानवता को मानों ग्रहण करने और अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। आचार्यश्री भी लोगों को आध्यात्मिक, व्यावहारिक और सामाजिक ज्ञान को प्रदान करते रहते हैं, ताकि लोग जीवन के प्रत्येक स्तर को उन्नत बना सकें।

शनिवार को आचार्य कालू महाश्रमण समवसरण में उपस्थित श्रद्धालु जनता को तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल पाथेय प्रदान करते हएु कहा कि भगवती सूत्र में एक प्रश्न किया गया चतुर्दश पूर्वी एक घड़े से हजार घड़े, एक कपड़े से हजार कपड़े, एक चटाई से हजार चटाई, एक रथ से हजार रथ आदि-आदि उत्पन्न कर सकता है क्या? उत्तर दिया गया है कि हां, वह ऐसा कर सकता है, करने में समर्थ है। फिर प्रश्न किया गया कि यह कैसे हो सकता है? उत्तर दिया गया कि चौदहपूर्वी ज्ञान एक अथाह ज्ञानराशि है। उस ज्ञानराशि में कुछ ऐसी राशियां भी आती हैं और वह मानों परिणति की विचित्रता होती है, वह ऐसा कर सकता है। उस ज्ञान के माध्यम से उसके भीतर अनंत द्रव्य लब्धि आ जाती है, जिसके माध्यम से वह ऐसा कर सकता है।

चौदह पूर्वों का ज्ञान एक अथाह ज्ञानराशि है। श्रुतज्ञान की दृष्टि से ज्ञानी व्यक्ति अथवा साधु हो सकता है। वह समर्थ होता है कि वह ऐसा कर सकता है। जादूगर जैसे कोई कार्य जादू से करता है तो वह अज्ञानी के लिए चमत्कार और ज्ञानी के लिए एक नियम के समान होता है, उसी प्रकार चौदह पूर्वों में इतना ज्ञान है कि इनको ग्रहण कर लेने वाला अथवा जान लेने वाला कुछ भी करने में समर्थ हो सकता है। जैसे एक प्रदेश में अनेक प्रदेशों का स्कंद समाविष्ट हो सकता है, उसी प्रकार यह कार्य भी हो सकता है। उस अथाह ज्ञानराशि में अनेक विद्याएं हैं, कौन कितना और किस प्रकार ग्रहण कर सकने में सक्षम है, यह उसकी योग्यता पर निर्भर करता है। जिस प्रकार आज वर्तमान समय में परमाणु शस्त्र आदि की विद्या है, यदि कोई इसका दुरुपयोग कर ले तो कितनी खतरनाक बात हो सकती है। बम ब्लास्ट की घटनाएं आती हैं। यह भी एक विद्या है, इसका शिक्षण और प्रशिक्षण भी होता है, लेकिन कई लोग निरपराध व्यक्तियों को मारने में कर लेते हैं। विद्याएं तो अनंत हैं, किन्तु उनका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। आदमी को अपनी विद्या का विकास और उसके सदुपयोग का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के छठे दिन जो अनुशासन दिवस के रूप में समायोजित था। इस संदर्भ में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में अनुशासन अपेक्षित और उपयोगी होता है। जिस प्रकार अनुशासनहीनता किसी संगठन अथवा समाज के लिए कठिनाई पैदा करने वाली हो सकती है। हम रामायण के अयोध्या की राजतांत्रिक प्रणाली से आज की लोकतांत्रिक प्रणाली देखें तो अनुशासन का कितना महत्त्व देखा जा सकता है। इस लोकतंत्र में तो कहा गया है कि कर्त्तव्यनिष्ठा और अनुशासन के अभाव में तो लोकतंत्र का देवता मृत्यु और विनाश को प्राप्त हो जाता है। अनुशासन की आवश्यकता हर जगह होती है, चाहे वह समाज हो, संगठन हो, परिवार हो अथवा देश हो। अनुशासन सभी अवस्था में परम आवश्यक है। विद्यार्थियों में, परिवारों में अनुशासन की चेतना रहे। इस प्रणाली में परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी का एक उद्घोष था कि निज पर शासन, फिर अनुशासन। पहले स्वयं पर शासन करो और फिर किसी पर अनुशासन करो तो अनुशासन का अच्छा प्रभाव हो सकता है। निज पर शासन और फिर अनुशासन की बात हो तो जीवन अच्छा हो सकता है। सभी अनुशासन में रहे तो यह कल्याणकारी हो सकता है।

एक दिन पूर्व हुए जैन विश्वभारती के निर्वाचन कार्यक्रम में नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री अमरचंद लूंकड़ ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए शपथ ग्रहण के साथ अपनी नवीन टीम की घोषणा की। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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